टॉपर: बोर्ड परीक्षा v/s प्रतियोगी परीक्षा
जोधपुर(दूरदृष्टीन्यूज),शिक्षा समाज का दर्पण है,किसी भी समाज,समुदाय की उन्नति का मापदंड शिक्षा ही है। शिक्षा विश्व में किसी भी देश समाज का आधार व आकलन है,क्योंकि शिक्षित समाज ही प्रगति,समानता और विकास की दिशा में आगे बढ़ता है। हाल ही में बोर्ड परीक्षाएँ जो विद्यार्थियों के जीवन का एक महत्वपूर्ण पड़ाव होती हैं उनके परिणाम लगातार प्रकाशित हो रहे हैं। 20वीं सदी में बोर्ड परीक्षा केवल एक परीक्षा नहीं, बल्कि वास्तविक ज्ञान,अनुशासन और परिश्रम का पैमाना हुआ करती थी। उस दौर में 60-70 प्रतिशत अंक प्राप्त करना भी बड़ी उपलब्धि माना जाता था,जबकि 80 प्रतिशत से अधिक अंक लाने वाले विद्यार्थी मेरिट सूची में स्थान बनाते थे।
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सीमित सत्रांक (लगभग 10%) और कठोर मूल्यांकन प्रणाली के कारण अंक कम,लेकिन गुणवत्ता उच्च होती थी। इसके विपरीत 21वीं सदी में शिक्षा व्यवस्था में कई परिवर्तन हुए हैं। विशेष रूप से राजस्थान सहित कई राज्यों में सत्रांक (इंटरनल मार्क्स) को बढ़ाकर 20 प्रतिशत कर दिया गया है। इसका परिणाम यह हुआ कि बोर्ड परीक्षाओं में 75 प्रतिशत अंक लाना सामान्य बात हो गई है और 90 प्रतिशत से अधिक अंक प्राप्त करने वाले विद्यार्थियों की संख्या तेजी से बढ़ी है। हर स्कूल में कई “टॉपर्स” दिखाई देते हैं,लेकिन वास्तविक प्रतिस्पर्धा और योग्यता का स्तर उतना मजबूत नहीं दिखता।
यही कारण है कि आज एक गंभीर प्रश्न सामने आता है-“बोर्ड परीक्षाओं में हीरो,लेकिन प्रतियोगी परीक्षाओं में जीरो क्यों?” इसका उत्तर शिक्षा प्रणाली के इस बदलाव में ही छिपा है। 20वीं सदी में विद्यार्थी सीमित संसाधनों के बावजूद आत्म- अनुशासन,निरंतर अभ्यास और गहरी समझ के साथ पढ़ाई करते थे। उस समय कम अंक लाने वाले भी जीवन में आगे चलकर बड़ी उपलब्धियाँ हासिल कर लेते थे, क्योंकि उनकी नींव मजबूत होती थी।
आज के दौर में अंकों की चमक तो बढ़ी है,परन्तु बोर्ड परीक्षा की तैयारी जो सिलेबस आधारित पढ़ाई से होती है,इसके विपरीत प्रतियोगी परीक्षा अवधारणात्मक समझ (Conceptual Understanding) और ट्रिक आधारित होती है,बोर्ड परीक्षा अपेक्षाकृत सरल तो प्रतियोगी परीक्षा कठिन और प्रतिस्पर्धात्मक आधरित,बोर्ड परीक्षा लिखने और याद करने पर तो प्रतियोगी परीक्षा समझ,गति और सटीक प्रश्नों के प्रकार,बोर्ड परीक्षा में प्रश्नों का प्रकार वर्णनात्मक,तो प्रतियोगी परीक्षा ज्यादातर वस्तुनिष्ठ होती है। अर्थात दोनो (बोर्ड व प्रतियोगी परीक्षा)के टॉपर एक हो जरूरी नही,क्योकि वर्तमान शिक्षा प्रणाली में अंक प्राप्त करना आसान हुआ है,इसके विभिन्न कारक जो समेकित है उत्तरदायी हो सकते है।
कई विद्यार्थी अच्छे अंक आने के बाद आत्मसंतुष्टि और मद का शिकार हो जाते हैं,जिससे उनकी भविष्य की तैयारी प्रभावित होती है। दूसरी ओर औसत या कम अंक प्राप्त करने वाले विद्यार्थी अपनी कमजोरियों को पहचानकर लगातार मेहनत करते हैं और प्रतियोगी परीक्षाओं में बेहतर प्रदर्शन कर जाते हैं। इसके अलावा, सही मार्गदर्शन का अभाव,गलत विषय चयन और बुरी संगति भी विद्यार्थियों को लक्ष्य से भटका देती है। 21वीं सदी में सोशल मीडिया, मोबाइल और त्वरित सफलता की चाह ने भी पढ़ाई की गंभीरता को प्रभावित किया है। इसके विपरीत, जो विद्यार्थी अनुशासन,निरंतर अभ्यास और सही दिशा में मेहनत करते हैं,वही अंततः सफलता प्राप्त करते हैं।
इस स्थिति को सुधारने के लिए आवश्यक है कि शिक्षा प्रणाली में केवल अंकों पर नहीं,बल्कि ज्ञान, कौशल और सोचने की क्षमता और अवधारणा आधारित ज्ञान पर भी ध्यान दिया जाए। सत्रांक प्रणाली में पारदर्शिता हो,मूल्यांकन निष्पक्ष हो, और विद्यार्थियों को प्रारंभ से ही प्रतियोगी परीक्षाओं के स्तर की तैयारी के लिए प्रेरित किया जाए। आखिरकार यह समझना जरूरी है कि सफलता केवल अंकों व परसेंटाइल की मोहताज नहीं होती। सच्ची लगन,कठोर परिश्रम,सही मार्गदर्शन और अनुशासन ही सफलता की असली कुंजी हैं। अतः विद्यार्थियों को चाहिए कि वे न तो अधिक अंकों पर अहंकार करें और न ही कम अंकों से निराश हों, बल्कि निरंतर अपने लक्ष्य की ओर बढ़ते रहें।
–अजय शर्मा,
वरिष्ठ अध्यापक,शिक्षा विभाग
