निज़ाम जैसे अदीब आज उर्दू में नहीं हैं-प्रो.शाफ़े क़िदवई

दो दिवसीय राष्ट्रीय सेमिनार तफ़्हीमे-निज़ाम का शुभारम्भ

जोधपुर(दूरदृष्टीन्यूज),निज़ाम जैसे अदीब आज उर्दू में नहीं हैं-प्रो.शाफ़े क़िदवई।तहक़ीक़ अवामी हाफ़िजे़ में अपना स्थान रखती है लेकिन अन्वेषक और सत्य की जांच परख रखने वाला मुहक्किक अवामी हाफ़िज़े को आइना दिखाता है, निज़ाम साहब के ग़ालिब,मन्टो, इस्मत चुग़ताई इत्यादि की कहानियों पर किये गये अन्वेषणात्मक विश्लेषण किया है। शीन काफ़ निज़ाम समग्र के लेखक और मानीख़ेज़ शख़्सियत हैं। निज़ाम बतौर मुहक़्क़िक़,तज़्किरानिगार फ़िक्शन के आलोचक और शाइर कई हैसियतों से पहचान रखते हैं।

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यह उद्गार अलीगढ़ के प्रतिष्ठित आलोचक,अनुवादक व स्तंभकार प्रोफेसर शाफ़े क़िदवई ने पद्मश्री शीन काफ़ निज़ाम के कृतित्व तथा व्यक्तित्व पर शनिवार को घूमर में आयोजित दो दिवसीय राष्ट्रीय सेमीनार के उद्घाटन सत्र में बतौर मुख्य वक्ता व्यक्त किये। जबकि सत्र की अध्यक्षता करते हुए हिंदी के मूर्धन्य कवि, आलोचक एवं विचारक प्रोफेसर नन्दकिशोर आचार्य ने परम्पराओं का ज़िक्र करते हुए रचनाकार कविता की संवेदना से प्रेरित होकर उस काव्य में अपने अग्रजों से सीखकर परम्परा में इज़ाफ़ा करते हुए उसे आगे बढाने का काम करता है,यह भी परम्पराओं के निर्वहन का एक मानीख़ेज़ तरीक़ा है। कविता में संप्रेषणात्मक अन्वेषण होता है जो पाठक को उसे समझने और आगे बढाने का भी एक प्रयास होता है।

आलोचना परम्पराओं से विद्रोह करना सिखाती है,साहित्य में केवल विश्लेषण तन्क़ीद नहीं होती बल्कि उसकी गहराई तक भी जाना होता है। वक्ताओं ने विशेष रूप से निज़ाम की नज़्म समन्दर के विभिन्न आयाम पर तब्सरों के संकेत दिये जिसके मानी आने वाले सत्रों में अधिक विस्तार से विश्लेषित किये जाएंगे।

कार्यक्रम संयोजक जयपुर के आदिल रज़ा मंसूरी ने बताया कि इस दो दिवसीय राष्ट्रीय सेमिनार के प्रथम दिन उद्घाटन सत्र में पूर्व राज्य मंत्री(दर्जाप्राप्त) रमेश बोराणा,पूर्व आईएफएस इस्हाक़ अहमद मुग़ल, डाॅ.कौशलनाथ उपाध्याय,प्रोफेसर एसपी व्यास ने अतिथियों के स्वागत उपरान्त सत्र प्रारम्भ किया। कार्यक्रम के मुख्य अतिथि कश्मीर से आए मुहम्मद ज़मा आज़ुर्दा ने शाइर, आलोचक एवं चिंतक पद्मश्री शीन काफ़ निज़ाम के कृतित्व तथा व्यक्तित्व पर अपने विचार व्यक्त करते हुए दुआइया कलेमात के साथ कहा कि किसी भी नज़़ारे को देखने के लिये रोशनी और बीनाई के साथ नज़रिया,तरबियत,माज़ी की सलाहियत और इल्म की ज़रूरत होती है। इन्सान दूसरों की तरफ़ देख पाता है ख़ुद को नहीं,उर्दू की नज़ाक़त और नफ़ासत में मानी दर मानी उसकी गहराई में उतरते हुए देखना हो तो उसका मज्मुअ़ा निज़ाम साहब में नज़र आता है।

दो घण्टे तक चले उद्घाटन सत्र में कोलकाता से प्रोफेसर शहनाज़ नबी, मक़सूद दानिश,दिल्ली के प्रोफेसर ख़ालिद अल्वी,शहज़ाद अन्जुम, प्रोफेसर ख़ालिद अशरफ़,अलीगढ़ के प्रोफेसर सग़ीर इफ़्राहीम,मुईद रशीदी,नोएडा की सफीना बेगम, शाइर और अफ़सानानिगार हबीब कैफ़ी,डाॅ.हरीदास व्यास,डाॅ. हरि प्रकाश राठी,डाॅ.पद्मजा शर्मा, रामकिशोर फिड़ौदा,मीठेश निर्मोही, शहर क़ाज़ी वाहिद अली,बसन्ती पंवार,डाॅ.कालूराम परिहार,डाॅ. मनीषा डागा,डाॅ. रेणुका श्रीवास्तव, चांदकौर जोशी,डाॅ. कैलाश कौशल, डाॅ.सरोज कौशल,तहज़ीब के सद्र मास्टर इस्हाक़ अहमद,शब्बीर हुसैन,डाॅ.निसार राही,अफ़ज़ल जोधपुरी सहित हिन्दी,उर्दू और राजस्थानी भाषा के साहित्यकार व रंगकर्मी उपस्थित थे। संचालन संयोजक आदिल रज़ा मन्सूरी ने किया।

स्थानीय संयोजक डाॅ.इश्राकुल इस्लाम माहिर ने बताया कि रविवार को आयोजित तीन सत्र के बाद शाम को ‘‘कलामे-निज़ाम‘‘ के तहत शीन काफ़ निज़ाम अपना कलाम पेश करेंगे।

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