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देश-विदेश के जन आस्था का केंद्र उत्तराखंड का कैंची धाम

15 जून को है स्थापना दिवस

@दया जोशी

श्रीकैंची धाम(नैनीताल),देवभूमि उत्तराखण्ड में एक ऐसा दिव्य बाबा का धाम है जिससे कोई भी भक्त खाली हाथ नहीं लौटता। बाबा को भगवान हनुमान का अवतार माना जाता है। बाबा के हाथों से कई चमत्कार हुए हैं। मानव उत्थान के लिए योगी संतों का समय- समय पर इस बसुंधरा में पर्दापण होता रहा है। तपोभूमि देवभूमि पर साधना करके संतों ने संसार में ज्ञान का जो प्रकाश फैलाया उसकी महत्ता समूचा विश्व जानता है। देवभूमि उत्तराखण्ड में स्थित कैंची धाम मंदिर विराट स्वरूप विश्व प्रसिद्व संत बाबा नीम करौली की अमूल्य धरोहर है। परोपकारी संतो में इनकी उपमा अतुलनीय है।

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हिमालय की गोद में बसा उत्तराखण्ड का यह क्षेत्र प्रकृति की अमूल्य अलौकिक धरोहर है। यहां की पावन रमणीक वादियों में सांसारिक मायाजाल में भटके मानव की समस्त व्याधियां इस प्रकार शांत हो जाती हैं जैसे अग्नि पाते ही तिनका भस्म हो जाता है। यहां की ऐतिहासिक रमणीय गुफाएं, सुंदर मनभावन मंदिर देवभूमि के दर्शन को आने वाले हर आगन्तुकों को अपनी ओर चुम्बकीय रुप से आकर्षित करता है। ऋषि-मुनियों की अराधना व तपःस्थली के रूप में प्रसिद्ध इस पावन भूमि के पग-पग पर देवालयों की भरमार है। सुन्दर झरने कल-कल धुन में नृत्य करती नदियां अनायास ही पर्यटकों व श्रद्धालुओं को अपनी ओर आकर्षित कर लेते हैं।

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देवभूमि उत्तराखण्ड की आलौकिक वादियों में से एक दिव्य रमणीक लुभावना स्थल ‘कैंची धाम’ है, जिसे ‘नीम किरौली धाम’ भी कहा जाता है।यहां वर्ष भर श्रद्धालुओं का तांता लगा रहता है। लाखों की संख्या में श्रद्धालु व भक्तजन यहां पहुंचकर अराधना व श्रद्धा के पुष्प ‘श्री करौली महाराज’ के चरणों में अर्पित करते हैं। हर साल 15 जून को यहां स्थापना दिवस पर एक विशाल मेले का आयोजन होता है। यहां पर श्रद्धा एवं विनय पूर्वक की गई पूजा कभी भी व्यर्थ नहीं जाती। मनौती पूर्णतया फलदायी कही गई है। क्षेत्रीय आस्थावान भक्तों के अनुसार ‘बाबा नीम करौली महाराज’ महान योगीराज थे। जनपद नैनीताल में स्थित ‘कैंची धाम’ मंदिर उत्तराखण्ड सहित देश-विदेश के तमाम श्रद्धालुओं की आस्थाओं का केंद्र है।

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भवाली के समीपस्थ स्थित इस मंदिर की स्थापना को लेकर कई रोचक कथाएं प्रसिद्ध हैं। कहते हैं कि 1962 के आसपास ‘श्री महाराज जी’ ने यहां की भूमि पर कदम रखा तथा उनके चरणों की आभा पाकर भूमि धन्य हुई। 1962 के लगभग जब बाबा यहां पहुंचे तो उन्होंने अनेक चमत्कारिक लीलाएं रचकर जनमानस को हतप्रभ कर दिया। एक चमत्कारिक कथा के अनुसार माता सिद्धि व तुलाराम शाह के साथ ‘बाबा नीम किरौली महाराज’ किसी वाहन से जनपद अल्मोड़ा के रानीखेत नामक स्थान से नैनीताल को आ रहे थे।

अचानक वे ‘कैंची धाम’ के पास उतर गये। इस बीच उन्होंने तुलाराम जी को बताया कि श्यामलाल अच्छा आदमी था, उन्हें यह बात अच्छी नहीं लगी, क्योंकि श्यामलाल जी उनके समधी थे। भाषा में ‘था’ के उपयोग से वे बेरूखे हो गए। खैर किसी तरह मन को काबू में रखकर वे अपने गंतव्य स्थल को चल दिये। बाद में उन्हें जानकारी मिली कि उनके समधी का हृदय गति रूकने से निधन हो गया। कितना अलौकिक दिव्य चमत्कार था ‘बाबा नीम करौली महाराज’ का कि उन्होंने दूर घटित घटना को बैठे-बैठे ही जान लिया। इस तरह की अनेक चमत्कारिक घटनाएं ‘बाबा नीम किरौली महाराज’ से जुड़ी हैं।

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इसी तरह 15 जून,1991 को घटी एक चमत्कारिक घटना के अनुसार ‘कैंची धाम’ में आयोजित भक्तजनों की विशाल भीड़ में बाबा ने बैठे-बैठे इस तरह निदान करवाया कि जिसे यातायात पुलिसकर्मी घंटों से नहीं करवा पाए। थक हार कर उन्होंने बाबा की शरण ली। आखिरकार उनकी समस्याओं का निदान हुआ। यह घटना आज भी खासी चर्चाओं में रहती है।
इसके अलावा एक बार यहां आयोजित भंडारे में ‘घी’ की कमी पड़ गई थी। बाबा जी के आदेश पर नीचे बहती नदी से कनस्तर में जल भरकर लाया गया। उसे प्रसाद बनाने हेतु जब उपयोग में लाया गया तो वह जल में ‘घी’ परिणित हो गया। इस चमत्कार से आस्थावान भक्तजन नतमस्तक हो उठे। एक अन्य चमत्कार के अनुसार ‘बाबा नीम किरौली महाराज’ जी ने एक बार गर्मी की तपती धूप में एक भक्त को बादल की छतरी बनवाकर उसे उसकी मंजिल तक पहुंचाया।

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इस तरह एक नहीं अनेक चमत्कारों की किंवदंतियां जुड़ी हुई हैं ‘नीम किरौली महाराज’ से। माना जाता है कि बाबा जी का जन्म अकबरपुर आगरा जिले के एक सामान्य ब्रहामण परिवार में 19 वी शताब्दी के आखिरी पड़ाव में हुआ था। बचपन में माता पिता इन्हें लक्ष्मी नारायण कहकर बुलाते थे। इन्होनें हनुमान जी की साधना की थी। इसी साधना के बल पर एक बार नीम करौरी गांव में इन्होनें ट्रेन की गति विराम कर दी थी। आम जनमानस में प्रचलित दतंकथा के अनुसार इन्हें टी टी ने चैकिग के दौरान नीचे उतार दिया था। सभी प्रयास के बाबजूद जब रेलगाडी आगे नहीं बढ़ी तो सभी ने बाबा से क्षमा मांगी जिसके बाद ट्रेन का इंजन ठीक हो गया और रेल रवाना हुई। हिमालय की भूमि में बाबा जी का आगमन 40 के दशक के आसपास माना जाता है।

हनुमानगढ़ी में हनुमान जी का मंदिर बाबा जी की भक्ति का ही परिणाम है। मानव जीवन की सार्थकता कहने वाले संत नीम करौली महाराज की अन्तिम लीला का क्षेत्र योगेष्वर भगवान श्री कृष्ण की नगरी वृन्दावन रही है। हनुमान जी की महिमा की ज्योति का प्रचार प्रसार इनके जीवन का लक्ष्य रहा तथा सौ से अधिक देशों में महाराज जी के आश्रम हैं। जनश्रुती के अनुसार बाबा जी का विवाह 11 वर्ष की आयु में हो गया था और 13 साल की अवस्था में इन्होंने घर छोड दिया था। उत्तराखण्ड व देश विदेश के अनेक भागों में बाबा जी द्वारा हनुमान मंदिर बनवाये, जिनमें कैची धाम भी एक है। इसके अलावा बाबा जी की प्रेरणा से पिथौरागढ में गणाई से आगे हनुमान मंदिर काफी प्रसिद्व है जहां इनके परम शिष्य ऋषिकेश गिरी महाराज तपस्या करते थे। साथ ही गेठिया भूमियाधार के हनुमान मंदिर भी बेहद प्रसिद्व हैं।

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