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स्वास्थ्य बीमा योजना में कोरोना मरीज को राशि दोबारा देने के आदेश

राजस्थान उच्च न्यायालय

जोधपुर, राजस्थान उच्च न्यायालय ने अपने एक आदेश में कहा कि मुख्यमंत्री चिरंजीवी स्वास्थ्य बीमा योजना के तहत कोरोना मरीज को दोबारा राशि देनी होगी। इससे पहले इलाज के दौरान खर्च राशि का पुनर्भुगतान नहीं किए जाने पर एक महिला ने राजस्थान हाईकोर्ट में याचिका दायर की थी। इस पर उच्च न्यायालय ने सीएमएचओ को उचित कार्रवाई करने के आदेश दिए हैं।

यह है मामला

मामले के अनुसार नागौर जिले के सरदारपुरा कलां निवासी शमीम बानो का परिवार खाद्य सुरक्षा अधिनियम के तहत पात्र परिवार है। खाद्य सुरक्षा अधिनियम के तहत पात्र सभी परिवार मुख्यमंत्री चिंरजीवी स्वास्थ्य बीमा योजना के तहत नि:शुल्क लाभ प्राप्त करने वाली श्रेणी में आते हैं। इसलिए प्रार्थीया मुख्यमंत्री चिरंजीवी स्वास्थ्य बीमा योजना के तहत नि:शुल्क उपचार का लाभ प्राप्त करने की हकदार है।

प्रार्थीया ने 15 मई 2021 को कोरोना संक्रमण के लक्षण प्रतीत होने पर जांच करवाई और जांच रिपोर्ट में कोविड-19 पॉजीटिव आने पर उसी दिन जोधपुर के मेडिसिटी हॉस्पिटल एण्ड रिसर्च सेंटर में उपचार के लिए भर्ती करवाया गया, क्योंकि उस दौरान सरकारी अस्पतालों में नो बेड की स्थिति थी। प्रार्थीया को 15 दिन बाद 29 मई को स्वस्थ होने पर डिस्चार्ज किया गया। इस दौरान करीब 2 लाख 47 हजार रुपए खर्च हुए। प्रार्थीया ने राजस्थान स्टेट हेल्थ इश्योरेंस एजेंसी, जिला कलक्टर और मुख्य चिकित्सा एवं स्वास्थ्य अधिकारी के समक्ष प्रतिवेदन देकर उक्त राशि के पुनर्भुगतान करने का आग्रह किया, लेकिन विभाग ने यह कहते हुए इनकार कर दिया कि उक्त चिकित्सा संस्थान मुख्यमंत्री चिरंजीवी स्वास्थ्य बीमा योजना से सम्बद्ध नहीं हुआ है। इसलिए पुनर्भुगतान किया जाना संभव नहीं है।

आदेश को दी गई चुनौती

प्रार्थीया की ओर से अधिवक्ता रजाक खान हैदर व सरवर खान ने इस आदेश को चुनौती देते हुए उच्च न्यायालय में रिट याचिका दायर कर कहा कि जिला कलक्टर ने उक्त चिकित्सा संस्थान को कोविड-19 के इलाज के लिए अधिकृत किया था। कोविड-19 के इलाज की अनुमति मिलने के कारण ही उक्त अस्पताल में कोरोना रोगियों का उपचार किया गया।

जहां पर बेड मिला वहां कराया इलाज

सरकारी अस्पताल और मुख्यमंत्री चिरंजीवी स्वास्थ्य बीमा योजना के पैनल अस्पतालों में उस समय नो-बेड की स्थिति होने के कारण प्रार्थीया को मजबूरी में जान बचाने के लिए जहां पर बेड मिला, वहां अपना इलाज करवाना पड़ा। उन विकट और विशेष परिस्थितियों को देखते हुए प्रार्थीया को नि:शुल्क इलाज के अधिकार से वंचित करना न्यायोचित नहीं है। सुनवाई के बाद उच्च न्यायालय के न्यायाधीश दिनेश मेहता ने मुख्य चिकित्सा एवं स्वास्थ्य अधिकारी को याचिकाकर्ता के प्रतिवेदन पर विधिनुसार उचित कार्रवाई करने के आदेश दिए हैं।

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