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लेखक पार्थसारथि थपलियाल

जिज्ञासा
पंचकुला (हरियाणा) के अमरेंद्र आर्य इस उलझन में थे कि कल्पना, संकल्पना और परिकल्पना में अंतर क्या है। वे मित्र हैं तो फोन पर बात कर ली।

समाधान
कई चीजें, अंग या कोई क्रिया या विशेषण ऐसा क्यों है? जैसे मैं पूछूं हाथ को हाथ क्यों कहते हैं तो भाषा विज्ञान को न जानने वाले के लिए विकट समस्या हो जाएगी। यहाँ तक कि ” है” कैसे अस्तित्व में आया। आज की जिज्ञासा के शब्द भी ऐसे ही हैं। आइये जानते हैं।

कल्पना – इसे ऐसे भी समझ सकते हैं माना कि आप भारत के प्रधानमंत्री हैं। आप हैं नही लेकिन कल्पना कर रहे हैं। मन मे एक दृश्य को उतपन्न कर महसूस कर रहे हैं कि आप प्रधानमंत्री हैं। या आप कल्पना कर रहे हैं आप हवाई जहाज में जा रहे हैं। इस तरह के ख्वाब मानव मस्तिष्क में आते ही रहते हैं। जो विचार मानव मन में बदलते रहते है, अस्थाई होते हैं उन्हें कल्पना कहते हैं।

संकल्पना – अधिकतर विचार हमारे संकल्प और विकल्प में से मथकर निकलते है। जो हमारी धारणा या अवधारणा निर्धारित करते हैं। इस प्रकार किसी कार्य को करने के लिए हम जो विवेचना करते हैं या विश्लेषण करते है, वह संकल्पना होती है।

परिकल्पना – किसी संकल्पना को मूर्त रूप देने के लिए तर्कपूर्ण विचार के बाद बौद्धिक निर्णय परिकल्पना है। परिकल्पना किसी गहन विषय के संदर्भ में ही की जाती है। ये अर्थ स्थिति विशेष में अपना अर्थ रखते हैं। मूल भाव यही है।

किसी भी पाठक को हिंदी शब्दों की व्याख्या की जानकारी चाहिए तो अपना प्रश्न “शब्द संदर्भ”में पूछ सकते हैं।

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