थे जो अपने दिखने वाले, निकले सारे बिकने वाले…
‘साहित्य संगम’ की गोष्ठी में राजनेताओं के चरित्र पर यथार्थ काव्य प्रस्तुति
जोधपुर(दूरदृष्टीन्यूज),थे जो अपने दिखने वाले, निकले सारे बिकने वाले…। शहर की सबसे पुरानी साहित्यिक संस्था ‘साहित्य संगम’ की ओर से रेलवे स्टेशन क्षेत्र स्थित सेठ रघुनाथदास परिहार धर्मशाला के सभागार में आयोजित मासिक काव्य गोष्ठी में शहर के प्रतिष्ठित रचनाकारों ने कविताओं के माध्यम से मौजूदा दौर के हालात,ज़िन्दगी के रंग और राजनेताओं के चरित्र पर यथार्थ प्रस्तुति दी।
संस्था के अध्यक्ष इंदीवर परिहार ने बताया कि गोष्ठी के प्रारम्भ में नामवर शाइर व कथाकार हबीब कैफी ने मौजूदा दौर की राजनीति में नेताओं की खरीद फ़रोख़्त की सच्चाई बयान करते हुए गज़ल’ थे जो अपने दिखने वाले-सारे निकले बिकने वाले,बुनियादें गहरी हैं जिनकी,रिश्ते हैं वो टिकने वाले,युवा कवि कुलदीप सिंह भाटी ने पेड़ के अंतर्मन की पीड़ा को व्यक्त करते कविता ‘चिड़िया के न लौट पाने के दुख में सूख गया पेड़ एक दिन’गजलकार सैयद मुनव्वर अली ने गज़ल ‘हो जहां साजिश की खेती और फ़रेबों के निशां, आदमी अब हो गया उस शहर सा आजकल’ पेश कर आज के इंसानी फितरत को शब्दों में पिरोया।
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इसके अलावा वरिष्ठ कवि नवीन पंछी ने आपसी रिश्तों को परिभाषित करते कविता ‘जो अपनों में अपनों से हिलमिल रह नहीं सकते,उन्हें यह हुनर सिखाने की कोशिशें गैर किया करते हैं’,शायर अशफाक अहमद फौजदार ने ‘यारों मीर ओ ग़ालिब सा कहता कौन है, रंग सृजनधर्मी रमेश भाटी नामदेव ने लोकदेवता बाबारामदेव प्राकट्योत्सव पर कविता ‘रूणेचा जगमग हुयो,खुशियां चारूं दिस,कुमकुम पगलया मांडिया-आप द्वारकाधीश एवं रज़ा मोहम्मद खान ने ग़ज़ल ‘झील के पानी में फिर न आई रवानी यारों,देखते- देखते हुई खत्म वो कहानी यारों ‘ प्रस्तुत कर खूब दाद हासिल की।
