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जोधपुर,आज अंतरराष्ट्रीय रंगमंच दिवस पर हम सभी प्रदर्शनात्मक कलाओं से जुड़े कलाकार विश्व व देश में पुनः पसरती कोरोना त्रासदी के भयावह परिणामों की कल्पना मात्र से कल के जीवन व समाज की तस्वीर को लेकर चिंतित हैं। अभी तक तो हम पिछले पूरे एक वर्ष में झेली पेट व मस्तिष्क की यंत्रणा से उबर ही नहीं पाए थे कि कोरोना के दूसरे दौर ने दस्तक दे दी है।

देश प्रदेश के गायक, वादक, नृतक, एक्टर, डायरेक्टर तथा मंच शिल्प व तकनीकी से जुड़े सेट डिजाइनर्स,लाइटमेन,मेकअप,ड्रेसमेन व अन्य बेक स्टेज वर्कर इस कोरोना संकट में सबसे ज्यादा और सबसे पहले प्रभावित हुआ। मैं राजस्थान के संदर्भ में अधिकृत रूप से कह सकता हूं कि यहां के अधिकांश कलाकार दैनिक पारश्रमिक भोगी हैं और लंबे लॉकडाउन व गाईड लाइन की पालना का वज्रपात सर्वाधिक इन्ही को भुगतना पड़ा। मुझे मालूम है अनेक कलाकारों के सामने भूखों मरने की नौबत तक आ गई थी।

नामचीन व स्वाभिमानी प्रवृति के होने के कारण चाह कर भी मदद मांगने में हिच किचाते रहे। सरकार से मदद भी हुई लेकिन वो पर्याप्त व सभी तक नहीं पहुंच पाई। नया वर्ष कुछ आशाएं व राहत देने की उम्मीद बंधा रहा था, सीमित दायरे में कार्यक्रम प्रारम्भ होने से रोजगार के अवसर भी खुलने लगे थे। सरकार व अकादमियों ने भी प्रदेश भर में संगीत, नृत्य,नाटक व लोक कलाओं के कार्यक्रम आयोजित कर कलाकारों को आर्थिक सम्बल प्रदान करने का प्रयास किया, लेकिन मार्च के मध्य तक आते कोरोना के काले बादल फिर मंडराने लगे हैं, साथ ही परिवार पालने की चिंता की लकीरें गहराने लगी है।

यह नंगी सच्चाई है कि ऐसी त्रासदियों व पाबंदियों में सबसे पहले और सबसे ज्यादा कलाकार ही पिसता है क्योंकि संगठित व सांस्थानिक क्षेत्र के कार्मिक की तरह इनको कोई सामाजिक सुरक्षा नहीं है। एक तरह से कहूं तो अतिशयोक्ति नहीं होगी कि कलाकार तो मजदूर से भी बदतर स्थिति में व दोहरी त्रासदी झेलने को मजबूर है।

इन सब आशंकाओं व असुरक्षा के बीच हम विश्व रंगमंच दिवस मनाने का साहस दिखा रहें हैं और अपने आपको प्रतिबद्ध करते हैं मैत्री, बन्धुता व विश्व शांति के साथ लोक कल्याण के विचार को मजबूती प्रदान करने हेतु हम कामना करते हैं कि मानवता फिर वो तांडव नहीं देखे, संत्रास नहीं सहे जो पिछले वर्ष देखा झेला था।

जीवन में फिर से बहार आए, हर होंठ पर मुस्कान और आत्मा को बल मिले। संसार में सुख शांति और समृद्धता का वातावरण निर्मित हो। सरकारों को भी चाहिये कि वे अभिव्यक्ति के जीवंत जंतु को बचाने व उसे सम्भालने की प्रभावी जीवटता दिखाएं। विश्वास है हम इस संत्रास से मुक्त हो कर फिर सामान्य जीवन जी सकेंगे तथा कलाएं पुनः अपनी खनक और चमक बिखेर सकेगी।

(रमेश बोराणा) वरिष्ठ नाट्यधर्मी व पूर्व अध्यक्ष राजस्थान संगीत नाटक अकादमी

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