विपक्ष की जिम्मेदारी -संवैधानिक संस्थाओं की मर्यादा
पार्थसारथि थपलियाल
लोकतंत्र में विपक्ष की भूमिका केवल सत्ता का विरोध करना नहीं,बल्कि सत्ता को जवाबदेह बनाते हुए राष्ट्रहित के प्रश्नों पर वैकल्पिक दृष्टि प्रस्तुत करना भी है। विरोध लोकतंत्र की शक्ति है, किंतु विरोध की राजनीति जब प्रत्येक व्यवस्था को संदेह के घेरे में खड़ा करने लगे, सामाजिक पहचान को राजनीतिक संघर्ष का आधार बनाने लगे,तब यह विचार करना आवश्यक हो जाता है कि राजनीति देश को किस दिशा में ले जा रही है।
कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने ‘नफरत के बाजार में मोहब्बत की दुकान’का नारा देकर राजनीति में सद्भाव और सामाजिक एकता का संदेश देने का प्रयास किया, लेकिन प्रश्न यह है कि क्या मोहब्बत का संदेश केवल आकर्षक शब्दों से स्थापित होता है, अथवा उसके लिए विरोधियों के प्रति भाषा, विचार और व्यवहार में भी संयम आवश्यक है? राजनीतिक विरोध को यदि लगातार नफरत, अन्याय और संस्थागत पक्षपात के आरोपों से जोड़ा जाए, तो संवाद की संभावनाएँ सीमित हो सकती हैं।
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राहुल गांधी की राजनीति में प्रतीकों की भूमिका भी चर्चा का विषय रही है। कभी वे मंदिरों में दर्शन करते हुए,माथे पर तिलक लगाए और अपनी धार्मिक पहचान के संदर्भ प्रस्तुत करते दिखाई दिए, उनके गोत्र संबंधी वक्तव्य भी सार्वजनिक बहस का हिस्सा बने। कोई व्यक्ति आस्थावान होते हुए भी राजनीतिक विचारधारा का विरोध कर सकता है। इसलिए प्रश्न उनके धार्मिक प्रतीकों के उपयोग मात्र का नहीं, बल्कि राजनीतिक संदेश की निरंतरता और उसकी वैचारिक स्पष्टता का है। यह सब दिखावा था, छलावा था या ढोंग था।
नेता प्रतिपक्ष की जातीय जनगणना की मांग भी इसी विमर्श का महत्त्वपूर्ण पक्ष है। राहुल गांधी इसे सामाजिक न्याय, प्रतिनिधित्व और संसाधनों में उचित भागीदारी से जोड़ते रहे हैं। इस मांग के पीछे वंचित समुदायों की वास्तविक स्थिति जानने का तर्क है, जिसे केवल राजनीतिक विरोध के आधार पर खारिज नहीं किया जा सकता। लेकिन यह भी उतना ही आवश्यक है कि जातिगत आँकड़ों का उपयोग सामाजिक असमानताओं को दूर करने के लिए हो, न कि समाज को स्थायी जातीय खाँचों में बाँटने के लिए। सामाजिक न्याय का उद्देश्य अवसरों की समानता और गरिमापूर्ण सहभागिता होना चाहिए। यदि जाति की पहचान ही राजनीतिक लामबंदी का स्थायी आधार बन जाए, तो सामाजिक समरसता और राष्ट्रीय एकात्मता के सामने नई चुनौतियाँ खड़ी हो सकती हैं।
लोकतंत्र की मजबूती उसकी संवैधानिक संस्थाओं की स्वतंत्रता, निष्पक्षता और विश्वसनीयता पर निर्भर करती है। संसद, निर्वाचन आयोग, न्यायपालिका और अन्य संवैधानिक संस्थाएँ किसी राजनीतिक दल की संपत्ति नहीं,बल्कि राष्ट्र की लोकतांत्रिक व्यवस्था के आधार स्तंभ हैं।
तत्कालीन राज्यसभा के सभापति जगदीप धनखड़ के प्रति विपक्ष की लामबंदी, लोकसभा अध्यक्ष के विरुद्ध अविश्वास प्रस्ताव, चुनाव आयोग पर अमर्यादित टिप्पणियां करना, राष्ट्रपति को प्रतिनिधि मंडल के साथ ज्ञापन देने का राजनीतिकरण करना निर्वाचन आयोग, सर्वोच्च न्यायालय की ओर राजनीतिक मार्च करना ये सब स्वस्थ लोकतंत्र के अनुकूल नहीं हैं।संसद और अन्य संस्थाओं की आलोचना करना नागरिकों तथा राजनीतिक दलों का लोकतांत्रिक अधिकार है।
इन संस्थाओं से प्रश्न पूछना भी आवश्यक है, क्योंकि कोई संस्था आलोचना से परे नहीं हो सकती। किंतु किसी आरोप को प्रमाणित तथ्य की तरह प्रस्तुत करना, प्रक्रिया की पूरी जानकारी के बिना अविश्वास फैलाना अथवा न्यायिक निर्णयों को केवल राजनीतिक चश्मे से देखना उचित नहीं है। दूसरी ओर,संस्थाओं से भी अपेक्षा है कि वे पारदर्शिता,निष्पक्षता और जवाबदेही के उच्च मानकों पर खरी उतरें। इसलिए आवश्यकता किसी संस्था को आलोचना से परे रखने की नहीं, बल्कि आलोचना को तथ्य-सम्मत और सुधारोन्मुख बनाने की है।
विपक्ष की जिम्मेदारी केवल अविश्वास व्यक्त करना नहीं,बल्कि प्रमाणों के आधार पर कमियों को उजागर करना और उनके समाधान के लिए ठोस प्रस्ताव देना भी है। लोकतंत्र में संस्थाओं की गरिमा और उनकी जवाबदेही एक-दूसरे की विरोधी नहीं,बल्कि पूरक हैं।
राहुल गांधी लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष हैं। उन्हें सरकार से कठोर प्रश्न पूछने का शिकार है। बेरोजगारी, महँगाई, शिक्षा, स्वास्थ्य, कृषि और सामाजिक विषमता जैसे विषयों पर उनकी आलोचना लोकतंत्र के लिए उपयोगी हो सकती है। लेकिन संसदीय कार्यवाही को बाधित करते रहना, लोक महत्व के विषयों का समय हंगामे में नष्ट करना लोकतंत्र नहीं हो सकता। राहुल गांधी के नेतृत्व में विपक्ष आए दिन जिस तरह का प्रदर्शन पर उतारू है उससे आम जनता को भरी कक्षाओं से गुजरना पड़ रहा है।
भारत आज आर्थिक विकास,तकनीकी परिवर्तन और वैश्विक प्रतिस्पर्धा के महत्त्वपूर्ण दौर से गुजर रहा है। इस यात्रा में मतभेद स्वाभाविक हैं,पर राष्ट्रीय प्रगति के लिए संस्थागत स्थिरता,सामाजिक विश्वास और लोकतांत्रिक संवाद भी आवश्यक हैं। सत्ता पक्ष को आलोचना सुनने का धैर्य रखना चाहिए और विपक्ष को आलोचना करते समय प्रमाण, मर्यादा तथा समाधान का ध्यान रखना चाहिए। राजनीति का उद्देश्य केवल सत्ता प्राप्त करना नहीं, समाज को दिशा देना है।
मोहब्बत की दुकान का वास्तविक अर्थ तभी सार्थक होगा,जब उसमें वैचारिक असहमति के लिए भी स्थान हो, विरोधी को शत्रु न माना जाए और सामाजिक न्याय की खोज सामाजिक विखंडन का कारण न बने। भारत की लोकतांत्रिक शक्ति इसी संतुलन में निहित है, जहाँ सरकार जवाबदेह हो, विपक्ष जिम्मेदार हो, संस्थाएँ स्वतंत्र हों और समाज राजनीतिक प्रतिस्पर्धा के बावजूद एकात्म बना रहे।
