राष्ट्रीय अस्मिता के प्रतीक: संविधान,राष्ट्रध्वज और राष्ट्रगान

पार्थसारथि थपलियाल

स्वतंत्रता किसी भी राष्ट्र के लिए केवल राजनीतिक परिवर्तन नहीं होती,बल्कि वह उसके सामूहिक आत्मसम्मान,सांस्कृतिक चेतना और ऐतिहासिक यात्रा का निर्णायक पड़ाव होती है। भारत ने 15 अगस्त 1947 को विदेशी दासता की बेड़ियों से भारत ने मुक्ति पाई,किंतु इस स्वाधीनता को पूर्ण स्वरूप 26 जनवरी 1950 को तब प्राप्त हुआ, जब भारत ने अपना संविधान अंगीकृत कर स्वयं को एक संप्रभु, लोकतांत्रिक गणराज्य घोषित किया। इसी क्षण से भारत में शासन की बागडोर विदेशी सत्ता से मुक्त होकर जनता के हाथों में आई। इस दिन भारत का अपना संविधान लागू हुआ,भारत की संप्रभुता के प्रतीक तिरंगा ध्वज फहराया गया और गणतंत्र में पहली बार राष्ट्रगान का सामूहिक उच्चारण हुआ। भारत ने विश्व समुदाय के समक्ष अपने गणतांत्रिक अस्तित्व की उद्घोषणा की तथा अपने गौरवशाली परंपराओं से विश्व को अवगत कराया।

राष्ट्र का संविधान,राष्ट्रध्वज और राष्ट्रगान किसी भी गणराज्य की अस्मिता और गौरव के मूर्त प्रतीक होते हैं। वे राष्ट्र के सांस्कृतिक वैभव, आदर्शों,बलिदानों और आकांक्षाओं का प्रतिनिधित्व करते हैं। अतः उनका सम्मान केवल संवैधानिक कर्तव्य नहीं,बल्कि भावनात्मक, सांस्कृतिक और ऐतिहासिक दायित्व भी है।

गणतंत्र में गण और तंत्र की स्थिति
गणतंत्र वह शासन-प्रणाली है जिसमें सत्ता का वास्तविक स्रोत जनता होती है। ‘गण’ का अर्थ है जनता और ‘तंत्र’ का अर्थ है शासन- व्यवस्था। इस प्रकार गणतंत्र का आशय ऐसी राजनीतिक व्यवस्था से है,जिसमें देश का सर्वोच्च पद किसी वंश,राजा या उत्तराधिकार के आधार पर नहीं,बल्कि जनता की इच्छा और संविधान के अनुसार निर्धारित होता है। गणतंत्र में राज्य का प्रमुख प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से जनता द्वारा चुना जाता है और वह निर्धारित अवधि तक ही पद पर रहता है।

गणतंत्र का मूल आधार समानता, स्वतंत्रता,न्याय और जन- उत्तरदायित्व है। इसमें प्रत्येक नागरिक कानून की दृष्टि में समान होता है और किसी को भी जन्म, जाति,धर्म या पद के कारण विशेषाधिकार प्राप्त नहीं होते। शासन जनता के हित में,जनता के द्वारा और जनता के प्रति उत्तरदायी होता है। संविधान गणतंत्र की आत्मा होता है,जो सत्ता की सीमाएँ निर्धारित करता है और नागरिकों के अधिकारों तथा कर्तव्यों को सुनिश्चित करता है। भारतीय गणतंत्र केवल राजनीतिक व्यवस्था नहीं,बल्कि राष्ट्रीय आत्मसम्मान, लोकतांत्रिक चेतना और नागरिक कर्तव्यबोध का सजीव प्रतीक है।

26 जनवरी 1950 से भारत की शासन-व्यवस्था,भारतीय जीवन पद्धति और समाज के जानकार लोगों द्वारा रचित भारतीय संविधान के अनुसार संचालित होने लगी। अंग्रेजी प्रशासनिक ढाँचा और इंडिया एक्ट 1935 का अंत हुआ। न्याय,स्वतंत्रता,समानता और बंधुत्व के मूल्यों पर आधारित नवभारत का उदय हुआ। राष्ट्रध्वज और राष्ट्रगान इन्हीं गणतांत्रिक आदर्शों को प्रतीकात्मक रूप में अभिव्यक्त करते हैं।

गणतंत्र दिवस का ऐतिहासिक महत्व
26 जनवरी 1950 का दिन भारतीय लोकतांत्रिक इतिहास का स्वर्णाक्षरी अध्याय है। संविधान सभा ने 26 नवंबर 1949 को संविधान को अंगीकृत कर लिया था,किंतु संविधान को लागू करने के लिए 26 जनवरी 1950 का चयन जानबूझकर किया गया। इसका कारण यह था कि 26 जनवरी 1930 को भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के लाहौर अधिवेशन में रावी नदी के तट पर “पूर्ण स्वराज” मांग की ऐतिहासिक घोषणा की गई थी। यह वह दिन था,जब भारत ने विदेशी शासन से पूर्ण स्वतंत्रता का संकल्प लिया।

संविधान निर्माण की गाथा
1942 में ‘भारत छोड़ो आंदोलन’ ने अंग्रेज़ सरकार को यह सोचने के लिए मजबूर कर दिया था कि अब भारत में उनके शासनकाल का अंत करीब है। सितंबर 1946 में पंडित जवाहरलाल नेहरू के नेतृत्व में अंतरिम सरकार का गठन हो चुका था। स्वाधीन भारत के तंत्र की शुरुआत हो गई थी। संविधान सभा का गठन 6 दिसंबर 1946 को हुआ। डॉ.राजेंद्र प्रसाद को संविधान सभा का अध्यक्ष चुना गया। 9 दिसंबर 1946 को संविधान सभा की पहली बैठक आयोजित हुई। समय-समय पर विभिन्न समितियों का गठन होता रहा। संविधान प्रारूप समिति का गठन 29 अगस्त 1947 को हुआ,जिसके अध्यक्ष डॉ. भीमराव अंबेडकर नियुक्त किए गए। इस समिति के संवैधानिक सलाहकार बीएन राव थे। प्रारूप समिति में कुल 7 सदस्य थे। संविधान सभा ने कुल 11 सत्रों में 165 बैठकें कीं। भारतीय संविधान को सुंदर हस्तलिपि में लिखने का कार्य प्रसिद्ध सुलेखक (Calligrapher) प्रेम बिहारी नारायण रायज़ादा ने किया।उन्होंने इसके लिए कोई पारिश्रमिक नहीं लिया और प्रत्येक पृष्ठ के अंत में अध्यक्ष की अनुमति से अपना नाम अंकित किया। मूल हस्तलिखित संविधान 251 पृष्ठों में है। इसमें भारत के इतिहास से जुड़े 22 प्रसंगों के चित्र शांति निकेतन के महान कलाकार नंदलाल बोस एवं उनकी टीम द्वारा बनाए गए।

26 नवंबर 1949 को संविधान अंगीकृत किया गया। इसके निर्माण में कुल 2 वर्ष 11 माह 18 दिन लगे। 26 जनवरी 1950 को संविधान लागू हुआ और भारत एक गणराज्य बना। 26 जनवरी,1950 को भारत के प्रथम राष्ट्रपति डॉ. राजेंद्र प्रसाद ने शपथ लेकर संविधान को लागू किया। भारतीय संविधान की प्रस्तावना को संविधान की आत्मा कहा जाता है। प्रस्तावना में संविधान के मूल आदर्श, सम्प्रभुता,समाजवाद,पंथनिरपेक्षता,लोकतंत्र,गणराज्य,न्याय,स्वतंत्रता, समानता और बंधुत्व समाहित हैं। यह संविधान के उद्देश्यों,दर्शन और दिशा को स्पष्ट करती है,इसलिए इसे संविधान की आत्मा और कुंजी माना जाता है। भारतीय संविधान विश्व का सबसे विस्तृत लिखित संविधान है। मूल रूप से संविधान में 22 भाग थे,किंतु समय के साथ संशोधनों के द्वारा अब यह 25 भागों में विभाजित है। जब संविधान 26 जनवरी 1950 को लागू हुआ, तब इसमें 395 अनुच्छेद और 8 अनुसूचियाँ थीं। वर्तमान में संशोधनों और पुनर्संरचनाओं के बाद संविधान में 448 अनुच्छेद और 12 अनुसूचियाँ हो गई हैं। अब तक भारतीय संविधान में 106 बार संशोधन किये जा चुके हैं। भारतीय संविधान स्थिर नहीं,बल्कि जीवंत दस्तावेज है,जिसकी आत्मा लोकतांत्रिक मूल्यों में निहित है।

भारत के राष्ट्रध्वज की निर्माण-गाथा
भारत का राष्ट्रध्वज स्वतंत्रता, संघर्ष,त्याग और सांस्कृतिक मूल्यों का सजीव प्रतीक है। राष्ट्रध्वज की अवधारणा स्वाधीनता आंदोलन के साथ विकसित हुई। 1906 में कोलकाता के पारसी बागान चौक पर पहली बार एक राष्ट्रीय ध्वज फहराया गया,जिसमें हरा,पीला और लाल रंग थे। 1907 में मैडम भीकाजी कामा ने जर्मनी के स्टटगार्ट में अंतरराष्ट्रीय मंच पर भारत का ध्वज फहराकर स्वतंत्रता की आकांक्षा को वैश्विक पहचान दिलाई। 1917 में होमरूल आंदोलन के दौरान बाल गंगाधर तिलक और एनी बेसेंट के नेतृत्व में एक नया ध्वज प्रचलन में आया। इस ध्वज में केसरिया,हरा और लाल रंग तथा ‘वंदे मातरम्’ अंकित था। सन 1917 में बाल गंगाधर तिलक और एनी बेसेंट के होम रूल आंदोलन के दौरान एक और ध्वज प्रचलन में आया,जिसमें ब्रिटिश झंडे के साथ सप्तर्षि मंडल और लाल-हरे रंगों का प्रयोग किया गया। वर्तमान राष्ट्रध्वज की आधारशिला महात्मा गांधी के विचारों से जुड़ी है। गांधी राष्ट्रीय ध्वज चाहते थे,जो भारत की एकता,विविधता और स्वराज्य के विचार का प्रतीक हो। पिंगली वेंकय्या,एक सैनिक, भू- विज्ञानी और झंडों के विशेषज्ञ, 1916 से विश्व के झंडों पर शोध कर रहे थे। उन्होंने 1921 में विजयवाड़ा कांग्रेस अधिवेशन में गांधीजी को अपना डिज़ाइन दिखाया। गांधीजी ने इसमें बीच की सफेद पट्टी में चरखा को बनाने का सुझाव दिया,जो आत्मनिर्भरता और स्वदेशी का प्रतीक था। बाद में इसी विचार को विकसित करते हुए 1931 में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस ने केसरिया,सफेद और हरे रंग के तिरंगा ध्वज को स्वीकार किया, जिसके मध्य में चरखा अंकित था। संविधान सभा में राष्ट्रध्वज के अंतिम स्वरूप पर विचार हुआ। 22 जुलाई 1947 को संविधान सभा ने सर्वसम्मति से वर्तमान तिरंगे को भारत के राष्ट्रध्वज के रूप में अपनाया। संविधान सभा के अध्यक्ष डॉ राजेंद्र प्रसाद के सुझाव पर चरखे के स्थान पर नीले रंग के वृताकार रूप में 24 तीलियों वाले, अशोक चक्र को रखा गया,जो सारनाथ स्थित अशोक स्तंभ से लिया गया है। यह धर्म,गति और न्याय का प्रतीक है। ध्वज में केसरिया रंग साहस और त्याग, सफेद शांति और सत्य तथा हरा समृद्धि और जीवन का द्योतक है।
इस प्रकार भारत के राष्ट्रध्वज की निर्माण गाथा केवल ऐतिहासिक घटनाओं की श्रृंखला नहीं,बल्कि एक राष्ट्र की आत्मा के निर्माण की कहानी है। तिरंगा आज भी हर भारतीय को कर्तव्य,एकता और राष्ट्रप्रेम की प्रेरणा देता है तथा स्वतंत्र भारत की पहचान बनकर विश्व मंच पर गर्व से लहराता है।

नागरिकों को राष्ट्रध्वज फहराने का अधिकार
2002 से पूर्व राष्ट्रध्वज का प्रयोग मुख्यतः सरकारी भवनों तक सीमित था। नवीन जिंदल द्वारा दायर याचिका पर सर्वोच्च न्यायालय ने 2002 में निर्णय दिया कि राष्ट्रध्वज फहराना नागरिकों का मौलिक अधिकार है। अब राष्ट्रीय ध्वज फहराना अधिक सुविधाजनक हो गया है। सन् 2021 में हर घर तिरंगा अभियान के अंतर्गत नियमों में संशोधन कर मशीन-निर्मित ध्वज को भी अनुमति दी गई।

ध्वज फहराने से संबंधित परंपराएँ
राष्ट्रध्वज फहराना केवल एक औपचारिक क्रिया नहीं,बल्कि राष्ट्र के प्रति सम्मान, निष्ठा और कर्तव्य बोध की परंपरा है। भारत में ध्वज फहराने की कुछ स्थापित परंपराएँ और मर्यादाएँ हैं,जिनका पालन करना प्रत्येक नागरिक का दायित्व है। ध्वज फहराने से पूर्व ध्वज को सलीके से मोड़ा जाता है और यह सुनिश्चित किया जाता है कि वह भूमि या किसी अन्य वस्तु को स्पर्श न करे। फहराते समय ध्वज को तेज,सधे और सम्मानपूर्ण ढंग से ऊपर ले जाया जाता है। ध्वजारोहण के साथ राष्ट्रगान या राष्ट्रध्वज के प्रति सम्मान की धुन बजाई जाती है और सभी उपस्थित व्यक्ति सावधान मुद्रा में खड़े होकर ध्वज की ओर मुख करके सम्मान प्रकट करते हैं। ध्वज को सदैव सही क्रम में फहराया जाता है। केसरिया रंग ऊपर,सफेद मध्य में अशोक चक्र सहित और हरा नीचे रहता है। ध्वज को कभी भी उल्टा नहीं फहराया जाता। सूर्यास्त के समय सामान्यतः ध्वज को उतार लिया जाता है,जब तक कि विशेष अनुमति न हो। राजकीय शोक की स्थिति में ध्वज को अर्धनमन (हाफ-मास्ट) में फहराया जाता है। इस अवस्था में पहले ध्वज को पूर्ण ऊँचाई तक ले जाकर फिर नीचे लाया जाता है। ध्वज उतारते समय भी उतनी ही गंभीरता और सम्मान का भाव रखा जाता है। इन परंपराओं का उद्देश्य राष्ट्रध्वज की गरिमा बनाए रखना और नागरिकों में राष्ट्रीय चेतना का संचार करना है।

राष्ट्रगान “जन गण मन” की कहानी
भारत का राष्ट्रगान ‘जन-गण-मन’ गुरुदेव रवींद्रनाथ ठाकुर द्वारा 1911 में रचित कविता ‘भारतो भाग्य विधाता’ का प्रथम पद है। इसे पहली बार 27 दिसंबर 1911 को कांग्रेस के कलकत्ता अधिवेशन में गाया गया। 24 जनवरी 1950 को संविधान सभा ने इसे आधिकारिक राष्ट्रगान के रूप में स्वीकार किया। ‘भारतो भाग्य विधाता’ नामक कविता में पाँच पद हैं। राष्ट्रगान में कुल 46 शब्द हैं और इसे गाने में 52 सेकंड लगते हैं। कई बड़े राजकीय आयोजनों,जैसे राष्ट्रपति भवन में विश्व नेताओं के साथ किसी बैठक या रात्रि भोज से पूर्व जो राष्ट्रगान बजाया जाता है, उसकी अवधि 20 सेकिंड होती है।

हमारा संविधान,राष्ट्रध्वज और राष्ट्रगान केवल प्रतीक नहीं,बल्कि भारत की प्रेरणा,आत्मा,बलिदानों की स्मृति और भारत की अस्मिता के प्रतीक हैं। ध्वज फहराना राष्ट्रीय गौरव है और राष्ट्रगान उस गौरव की आराधना है। संविधान हमें अधिकार देता है,कर्तव्यों का बोध कराता है और लोकतांत्रिक मर्यादाओं में बाँधता है। तिरंगा राष्ट्रध्वज त्याग, सत्य,शांति और समृद्धि के आदर्शों के साथ अनगिनत बलिदानों की स्मृति को लहराता है,जबकि राष्ट्रगान जन-जन के हृदय में एकता, अनुशासन और राष्ट्रप्रेम की चेतना जगाता है। जब संविधान का सम्मान व्यवहार में उतरता है, तिरंगा मर्यादा के साथ फहराया जाता है और राष्ट्रगान श्रद्धा से गाया जाता है,तब भारतीय अस्मिता केवल शब्दों में नहीं,बल्कि कर्मों में जीवित होती है। इन प्रतीकों के प्रति सम्मान ही भारत के उज्ज्वल भविष्य,राष्ट्रीय एकता और लोकतांत्रिक शक्ति की सुदृढ़ आधारशिला है।

(लेखक आकाशवाणी से सेवानिवृत कार्यक्रम अधिकारी,वर्तमान में स्वतंत्र पत्रकार एवं लेखक हैं।)

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