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सामाजिक समरसता और लोकमंगल पर्व:होली

संस्कृति:बसंतोत्सव (3)

-पार्थसारथि थपलियाल

होली एक लोक उत्सव है जिसमें प्रकृति भी शामिल होती है। बसंत ऋतु की मादकता सर्वत्र दिखाई देती है। यह ऋतु मनुष्य के व्यवहार में आये अहंकार को भी तोड़ती है। कोई शिष्ट नही होता कोई विशिष्ट नही होता। यह बसंतोत्सव और विशेषत: होली की विशेषता होती है। गांवों में महीने भर पहले से फाग (होली के गीत) के गीत शुरू हो जाते हैं। चंग या डफ की थाप और लय विशेष में गाये जानेवाले गीत किसी को भी थिरकने को मजबूर कर देते हैं। हास-परिहास और मनोविनोद पूर्ण गीत सामाजिक एकरूपता को प्रकट करते हैं। बुरा न मानो होली है। यह जाति/वर्ग भेद रहित त्यौहार है। यह त्यौहार ज़ामजिक समरसता स्थापित करने का बहुत बड़ा उपकरण साबित हुआ है।

होलाष्टक

पुराणों में कथा है कि हिरण्यकश्यप ने अपने पुत्र प्रह्लाद जो विष्णु भक्त था और विष्णु भक्त या किसी अन्य की पूजा राजा की इच्छा के विरुद्ध थी, इसलिए हिरण्यकश्यप ने प्रह्लाद को यातनाएं देने का काम होली से 8 दिन पहले शुरू कर दिया था। हर क्रूर प्रताड़ना में प्रह्लाद बच जाता था। अंत मे उसने अपनी बहन होलिका, जिसे यह वरदान था कि वह अकेली स्थिति में कभी भी आग से नही जल पाएगी, उससे आग्रह किया कि वह प्रचंड अग्नि में प्रह्लाद को लेकर बैठे जिससे प्रह्लाद जलकर मर जाए। होली शब्द इसी होलिका का लघु रूप है। क्योंकि इन आठ दिनों में भगवान के भक्त प्रह्लाद को यातनाएं, प्रताड़नाएं दी गई थी इसलिए होलाष्टक के दिनों में समाज मे शुभ कार्य वर्जित रहते हैं। नव वधु को ससुराल से लाना या मायके भेजना, गर्भाधान, पुंसवन, जातकर्म आदि 16 संस्कार न करना, नया कारोबार शुरू न करना आदि।

होली

होली फाल्गुन/फागुन मास की पूर्णिमा को जलाई जाती है। होलाष्टक (होली से 8 दिन पूर्व) में होलिका दहन स्थल की सफाई की जाती है। उसे गंगा जल छिड़ककर पवित्र किया जाता है एक गोलाकार स्थान के बीचों बीच होलिका और प्रहलाद के प्रतीक दो डंडे रोप दिए जाते हैं। ग्रामीण क्षेत्रों में होली का झंडा भी पूजा जाता है। प्रतिदिन इस स्थल पर दीपक भी जलाया जाता है। होली खेलने वालों को अलग-अलग जगहों पर स्थानीय नामों से पुकारा जाता है ब्रज में पुरुषों को हुरियारे और महिलाओं को हुरियारिन कहा जाता है। ये टोलियां गांव-गांव चंग या ढोलक के साथ होरी गायन करते हैं। होली का तिलक लगाकर रंग अबीर-गुलाल लगाने का आदान प्रदान सभी के साथ हंसी मजाक,मनो-विनोद होता है। हुरियारों का सभी लोग स्वागत करते हैं। अपनी श्रद्धानुसार आटा,दाल,चावल या धन राशि देते हैं।

होली के दिन शाम तक लकड़ियां, उपले/कंडे आदि से होली बनाई जाती है। शुभ मुहूर्त में होली जलाई जाती है। नव विवाहितों, शिशुओं को लूग विशेष रूप से परिक्रमा करवाते हैं। जलती अग्नि में लोग गेंहू की बाल, चना और गन्ना आदि भी डालते हैं बचे भाग को प्रसाद के रूप में बांटते हैं। होली की भस्मी का टीका भी लगाया जाता है। ग्रामीण क्षेत्रों में हुरियारों को जो समान दानदाताओं ने दिया होता है उसे बड़े-बड़े बर्तनों में पकाते हैं और गांव के लोग मिलजुल कर खाते हैं। ऐसा अनेक अंचलों में पाया जाता है।

होला मोहल्ला

गुरु गोविंद सिंह जी ने 1680 में पहली बार आनंदपुर साहिब में होलगढ़ में होला मोहल्ला का आयोजन किया था। यह पुरुष प्रधान कार्य है इसलिए होली के बजाय होला कहा गया, मोहल्ला का अभिप्राय सैन्य करतबों से है, जिसे बनावटी युद्ध भी कह सकते हैं। खासकर निहंग सरदार घोड़ों पर तरह-तरह के युद्ध कौशल दिखाते हैं। इसका समापन शिवालिक पर्वत शृंखला में चरण गंगा के तट पर किया जाता है।

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