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एनएसए अजीत डोभाल पर राहुल गांधी की नफरती टिप्पणी

✍🏻पार्थसारथि थपलियाल

‘नफ़रत के बाज़ार में मोहब्बत की दुकान’ खोलने का दावा करने वाले राहुल गांधी क्या यह भूल गए हैं कि राजनीतिक विरोध का उद्देश्य प्रतिद्वंद्वी को परास्त करना है,राष्ट्रहित को कमजोर करना नहीं? राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजीत डोभाल के प्रति उनकी टिप्पणी ने यही प्रश्न खड़ा किया है।

इंदौर में 19 सितंबर 2026 को राहुल गांधी ने डोभाल पर नागरिकों के फोन और डिजिटल संचार पर निगरानी रखने के आरोप लगाए थे। इसके बाद 10 अक्टूबर को उन्होंने डोभाल सहित पाँच व्यक्तियों को राजनीतिक संघर्ष के संदर्भ में ‘खलनायक’ कहा। यह बयान बाजी अब राजनीतिक भाषा की मर्यादा और राष्ट्रीय सुरक्षा पर विमर्श की गंभीरता के परीक्षण का विषय है।

अजीत डोभाल जिन्हें भारत राष्ट्रीय सुरक्षा का सुदृढ़ लौह पुरुष माना जाता है,उनके महत्व को समझता है उनमें राहुल गांधी की अस्वीकार्य टिप्पणी से जबरदस्त आक्रोश है। राहुल गांधी को कभी अपना मूल्यांकन करना चाहिए। अजीत डोभाल कोई सामान्य प्रशासनिक अधिकारी नहीं हैं। उनका जीवन भारतीय पुलिस सेवा,खुफिया तंत्र और राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़ी लंबी सेवा का उदाहरण है।

केरल कैडर के 1968 बैच के आईपीएस अधिकारी डोभाल ने तीन दशक से अधिक समय तक खुफिया व्यवस्था में काम किया और बाद में इंटेलिजेंस ब्यूरो के निदेशक बने। उन्हें विशिष्ट सेवाओं के लिए कीर्ति चक्र से सम्मानित किया गया। मई 2014 में उन्हें राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार नियुक्त किया गया। उनके योगदान का उल्लेख करते हुए सरकार ने पूर्वोत्तर, सिक्किम,जम्मू-कश्मीर,पंजाब और पाकिस्तान से जुड़े सुरक्षा संबंधी कार्यों में उनकी भूमिका को रेखांकित किया है। उनके कार्यक्षेत्र का स्वभाव ही ऐसा है कि अनेक योगदान सार्वजनिक रूप से विस्तार से बताए नहीं जा सकते। खुफिया सेवाओं में सफलता का अर्थ हमेशा सार्वजनिक प्रशंसा या उपलब्धियों का प्रचार नहीं होता।

कई बार किसी संकट का टल जाना,किसी बड़ी क्षति का रुक जाना या किसी खतरे का समय रहते पता चल जाना ही सबसे बड़ी उपलब्धि होती है। ऐसे क्षेत्र में काम करने वाले व्यक्ति के मूल्यांकन के लिए सनसनीखेज राजनीतिक विशेषण नहीं,बल्कि उपलब्ध तथ्यों,संस्थागत उत्तरदायित्व और राष्ट्रीय हित की कसौटी आवश्यक है। पूरा भारत उन पर गर्व अनुभव करता है। अजीत डोभाल,राहुल गांधी की घटिया टिप्पणी के नहीं, “भारत रत्न” के हकदार हैं। इस पर विचार किया जाना चाहिए।

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डोभाल को भारत का महानायक कहना केवल किसी व्यक्ति के प्रति प्रशंसा व्यक्त करना नहीं, बल्कि उस व्यापक परंपरा का सम्मान करना है जिसमें राष्ट्र की सुरक्षा को निजी सुविधा और व्यक्तिगत महत्त्वाकांक्षा से ऊपर रखा जाता है। फिर भी किसी अधिकारी के प्रति सम्मान का अर्थ यह नहीं कि उसके निर्णयों पर प्रश्न नहीं उठाए जा सकते। लोकतंत्र में राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार भी सार्वजनिक विमर्श से परे नहीं हैं। यदि राहुल गांधी के पास नागरिकों की निजता के उल्लंघन या अवैध निगरानी से संबंधित प्रमाण हैं,तो उन्हें प्रमाण सहित सामने रखना चाहिए। गंभीर आरोपों की जाँच होनी चाहिए,लेकिन आरोपों को प्रमाणित तथ्य मान लेना उचित नहीं है।

यहीं राहुल गांधी की राजनीतिक भाषा पर प्रश्न उठता है। विपक्ष का काम सरकार से जवाब माँगना, नीतियों की समीक्षा करना और सत्ता को जवाबदेह बनाना है। लेकिन जब तर्क और प्रमाण के स्थान पर ‘खलनायक’ जैसे विशेषण आने लगें,तब विमर्श का केंद्र वास्तविक मुद्दों से हटकर व्यक्ति- आधारित टकराव बन जाता है। क्या राष्ट्रीय सुरक्षा जैसे संवेदनशील विषय पर यही जिम्मेदार राजनीतिक व्यवहार है? क्या सत्ता का विरोध करने के लिए हर उस व्यक्ति को राजनीतिक शत्रु की श्रेणी में रखना आवश्यक है जो सरकार के साथ काम कर रहा है? भारतीय लोकतंत्र संसदीय मर्यादाओं और असहमति की स्वस्थ परंपरा से समृद्ध हुआ है।

सत्ता पक्ष हो या विपक्ष,किसी को भी राष्ट्रहित पर एकाधिकार का दावा नहीं करना चाहिए। किंतु राष्ट्रीय नेतृत्व का आकांक्षी व्यक्ति जितना अधिकार माँगता है, उतनी ही जिम्मेदारी भी उसे निभानी पड़ती है। जनता को यह अपेक्षा करने का अधिकार है कि नेता अपनी आलोचना में तथ्य रखें,अपने आरोपों के लिए प्रमाण प्रस्तुत करें और संस्थाओं के प्रति अपनी असहमति को व्यक्तिगत अपमान में न बदलें।

राहुल गांधी को यह भी समझना चाहिए कि ‘मोहब्बत की दुकान’ केवल एक राजनीतिक नारा नहीं,बल्कि व्यवहार की कसौटी भी है। यदि किसी राष्ट्रीय सुरक्षा अधिकारी से असहमति है,तो उसके निर्णयों पर प्रश्न उठाइए। यदि कोई अनियमितता है,तो उसके प्रमाण दीजिए लेकिन किसी व्यक्ति को राजनीतिक कथा का खलनायक घोषित कर देना न तो आरोप सिद्ध करता है और न ही लोकतांत्रिक संवाद को मजबूत बनाता है।

राष्ट्रनायकों का सम्मान करना लोकतंत्र के विरुद्ध नहीं,बल्कि राष्ट्र के प्रति कृतज्ञता का परिचायक है। राष्ट्रीय नेतृत्व का सपना देखने वाले प्रत्येक व्यक्ति को यह समझना होगा कि भारत की सत्ता किसी की वंशगत हकदारी नहीं,बल्कि जनता के विश्वास से मिलने वाला उत्तरदायित्व है। राष्ट्रहित,मर्यादा और प्रमाणपरक संवाद से ही उस विश्वास की रक्षा की जा सकती है।(लेखक के विचार)