होली के गीतों के रंग में रंग गए मानवाधिकार आयोग के अध्यक्ष गोपाल कृष्ण व्यास

जस्टिस व्यास ने होली के कई गीत सुनाए

जोधपुर, परकोटे के भीतरी शहर जूनी धान मंडी में स्थित गंगश्यामजी मंदिर में चल रही होरी गायन में रविवार को
राजस्थान मानवाधिकार आयोग के अध्यक्ष जस्टिस गोपाल कृष्ण व्यास ने होली के कई गीत सुनाए। कार्यक्रम संयोजक अशोक बिच्छू ने बताया कि यूं तो मंदिर में पूरे वर्ष होने वाले अनेक तीज त्योहारों पर भीतरी शहर के लोग उत्साह से भाग लेते रहते हैं और यहां पर भक्ति भाव की अलग ही छटा देखने को मिलती है।

उन्होंने बताया कि फागुन के पूरे माह यहां पर होली के गीत और नृत्य की टोलियां भक्ति भाव में झूमती नजर आती हैं। प्रातः काल के समय अधिकांश रंगों और पुष्पों के संग होली खेलते भक्त नजर आते हैं, मध्यान पश्चात यहां पर स्वर लय ताल का एक अनूठा संगम देखने को मिलता है। भीतरी शहर की अलग- अलग भक्तिमय टोलिया अपने साधनों के साथ एकत्रित होकर के अपने मन के उदगार फागुन मास में फागुन गीतों के साथ प्रस्तुत करती हैं और इन्हें देखने के लिए पूरा शहर उमड़ पड़ता है।

होली के गीतों के रंग में रंग गए मानवाधिकार आयोग के अध्यक्ष गोपाल कृष्ण व्यास

जस्टिस व्यास बाल्यकाल से ही इस मंदिर के परम भक्त रहे हैं। वे अपने साथी संगी और परिवार के साथ गंगश्यामजी के मंदिर पहुंच गए जहां पर उन्होंने कई गीत सुनाए। इस गायन में तबले पर संगत पंडित सतीश चंद्र बोहरा और हारमोनियम पर संगत कर रहे थे पंडित संजय बोहरा, अशोक शर्मा ने ढोलक पर थे। जस्टिस गोपाल कृष्ण व्यास ने होरी गायन से पूर्व गणेश वंदना प्रस्तुत की उसके बाद एक के बाद एक कई होरियां प्रस्तुत की जिसमे मैं कैसे होली खेलू रे इन सांवरिया के संग.. सांवरिया होली खेले रे विरज रे मायने.. कान्हा घरेलू मुकुट खेलो मो संग होरी.. होली खेलत नंदलाल बिरज में.. रसीयो फागण रो.. हां रे लारो छोड़ दे सांवरिया थारे पाय लागू रे.. ओ जी मारो मोहन मुरली वालो रे उबो जमूनारे तीर.. आदि गीत सुनाए।

होली के गीतों के रंग में रंग गए मानवाधिकार आयोग के अध्यक्ष गोपाल कृष्ण व्यास

कार्यक्रम का संचालन पंडित सतीश चंद्र बोहरा ने किया।

उन्होंने बताया कि यहां पर होरी उत्सव पंचमी से रंग पंचमी तक गाए जाते हैं और पांडीया उत्सव के साथ फाग उत्सव का समापन होता है।

मंदिर का इतिहास

प्रतिष्ठित भगवान श्याम की प्रतिमा जोधपुर नरेश राव गांगा को बतौर दहेज में मिली थी। राव गांगा (1515 से 1531) का विवाह सिरोही के राव जगमाल की पुत्री रानी देवड़ी से हुआ था। राजकुमारी की श्याम प्रतिमा में गहरी आस्था थी। विवाह के बाद सिरोही से विदा होते समय राव जगमाल ने पुत्री की आस्था को देखते हुए कृष्ण की मूर्ति और ठाकुरजी की नियमित सेवा पूजा के लिए सेवग जीवराज को भी साथ दहेज के रूप में जोधपुर भेज दिया।

पहले तो राव गांगा ने मूर्ति को मेहरानगढ़ में रखवाया। कुछ समय बाद में जूनी मंडी में विशाल मंदिर का निर्माण करवाने के बाद उसमें मूर्ति की प्रतिष्ठा करवा दी। गांगा की ओर से निर्मित श्यामजी का मंदिर ही बाद में गंगश्यामजी का मंदिर कहलाया। वैष्णव परंपरा के अनुसार मंदिर में कुल छह बार आरती होती है जिनमें मंगला, शृंगार, राजभोग, उत्थापन, संध्या और शयन आरती प्रमुख हैं। कलात्मक दृष्टि से मंदिर अत्यंत सुंदर तथा शहर के मध्य स्थित होने के कारण श्रद्धालुओं का तांता लगा रहता है।

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