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किसी व्यक्ति का अपने माता-पिता भाई या पति के साथ रहना अवैध हिरासत नहीं: हाईकोर्ट

याचिकाकर्ता पर 25 हजार का लगाया जुर्माना

जोधपुर(दूरदृष्टीन्यूज),किसी व्यक्ति का अपने माता-पिता भाई या पति के साथ रहना अवैध हिरासत नहीं: हाईकोर्ट। शादीशुदा महिला के साथ लिव-इन रिलेशनशिप में रहने का समझौता करना एक शख्स को भारी पड़ गया। राजस्थान हाईकोर्ट ने उसकी याचिका खारिज करते हुए 25 हजार का जुर्माना लगा दिया। युवक ने कोर्ट से महिला को पेश कराने की मांग की थी। उसका दावा था कि दोनों अपनी मर्जी से साथ रहना चाहते हैं, लेकिन महिला के परिवार वालों ने उसे रोक रखा है।

हालांकि,सुनवाई के दौरान कोर्ट को ऐसे कोई सबूत नहीं मिले, जिससे लगे कि महिला को उसकी मर्जी के खिलाफ घर में रोका गया था। जस्टिस मुन्नूरी लक्ष्मण और जस्टिस आशुतोष कुमार की बेंच ने कहा कि महिला की पहली शादी कायम रहते हुए दूसरे व्यक्ति के साथ लिव-इन एग्रीमेंट करने से युवक को उसे अपनी पत्नी बताकर बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका दायर करने का अधिकार नहीं मिल जाता। इसी आधार पर हाईकोर्ट ने याचिका खारिज करते हुए युवक को 4 सप्ताह के भीतर जुर्माने की रकम चाइल्ड सेक्रेटेरिएट में जमा कराने का आदेश भी दिया।

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बीकानेर के रहने वाले 24 साल के युवक ने हाईकोर्ट में बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका दायर की थी। उसने महिला को अपनी पत्नी बताते हुए कोर्ट से उसे पेश कराने की मांग की। याचिका में बताया गया था कि दोनों एक- दूसरे से प्यार करते हैं और 1 अक्टूबर 2026 को दोनों ने अपनी मर्जी से लिव-इन रिलेशनशिप में रहने का समझौता किया था। युवक का कहना था कि दोनों बालिग हैं और उन्हें अपनी मर्जी से साथ रहने का अधिकार है।

उसने आरोप लगाया कि महिला को उसके परिवार वालों ने रोक रखा है। युवक ने पुलिस और संबंधित अधिकारियों को शिकायत देने के बावजूद कार्रवाई नहीं होने की बात भी कही।

महिला की पहले से शादी,3 महीने का बच्चा भी
राज्य सरकार की ओर से कोर्ट को बताया गया कि महिला की शादी पहले से दूसरे व्यक्ति के साथ हो चुकी है और यह शादी अब भी कायम है। इस शादी से महिला का 3 महीने का बच्चा भी है।

सरकार ने दलील दी कि याचिकाकर्ता ने ये अहम तथ्य अपनी याचिका में नहीं बताए और महिला को अपनी पत्नी बताया, जबकि कानून के तहत उसे ऐसा दर्जा प्राप्त नहीं है। सरकार ने यह भी कहा कि महिला को उसके परिवार वालों की ओर से जबरन रोककर रखने का कोई ठोस सबूत रिकॉर्ड पर नहीं है। ऐसे में महिला को कोर्ट में पेश कराने के लिए बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका का इस्तेमाल नहीं किया जा सकता।

हाईकोर्ट ने कहा कि अगर किसी महिला की पहली शादी अभी कायम है, तो दूसरे व्यक्ति के साथ लिव-इन में रहने का समझौता करने भर से उस रिश्ते को शादी जैसा कानूनी दर्जा नहीं मिल जाता। ऐसे में पहले पति या पत्नी के कानूनी अधिकारों को भी नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।

हाईकोर्ट ने कहा कि किसी व्यक्ति का अपने माता-पिता,भाई या पति के साथ रहना अपने आप में अवैध हिरासत नहीं माना जा सकता। ऐसे मामलों में संबंधित व्यक्ति को उसकी इच्छा के विरुद्ध गैरकानूनी रूप से रोके जाने के समर्थन में ठोस और प्रभावी साक्ष्य प्रस्तुत करना आवश्यक है।