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मेरी गढ़वाल यात्रा:-(2) राजनीतिक व सांस्कृतिक परिदृश्य

लेखक:- पार्थसारथि थपलियाल

(मेरी यात्रा इतिहास और संस्कृति को जोड़ते हुए ज्वालपा धाम से परिचय करवाते हुए आगे बढ़ने की है। इसलिए अन्य पहलुओं की अनदेखी की जा रही है) गढ़वाल नरेश अजयपाल के शासन काल में उन्होंने चांदपुर गढ़ी से अपनी राजधानी देवलगढ़ (1512 ई.में) बनाई। एक दिन राजा के सपने में देवी आई और देवी ने कहा कि तुम अपनी राजधानी श्रीयंत्र के क्षेत्र को बनाओ। पांच साल बाद राजा अजयपाल ने श्रीनगर (गढ़वाल) को अपनी राजधानी बनाया। जहां 1815 ई.तक गढ़वाल की राजधानी रही। इसके साथ ही राजकाज से जुड़े अनेक लोग भी श्रीनगर के निकटवर्ती गॉवों में आकर बस गए। डॉक्टर शिव प्रसाद नैथानी (सेवानिवृत्त प्राध्यापक, इतिहास) के अनुसार उस काल में श्रीनगर में ज्वालपा देवी का मंदिर था, जहां पर गंगा तट पर वार्षिक अनुष्ठान होता था और गढ़वाल का सबसे बड़ा मेला लगता था। जिसमे हज़ारों लोग इकठ्ठा होते थे। एक बार गंगा जी में बहुत बड़ी बाढ़ आई और वह मंदिर बह गया। इधर थापली गांव में बसने के कारण दलती सती के वंशजों को थापली गांव में बसने के कारण थापलिवाल…. थापलियाल….. और थापल्याल नामों से ख्याति मिली। एक अध्ययन के अनुसार हमारी उपजातियों के नाम के तीन आधार हैं।

1.स्थानबोधक (गाँव के नाम से)  2. वंशबोधक (पूर्व पुरुष के नाम से) और  3. कर्मबोधक (कार्य विशेष से जुड़े होने के कारण) उत्तराखण्ड में अधिकतर जातियां स्थान बोधक हैं। थापली गाँव से पंडित नागचंद थपलियाल ग्राम थापली कफोल स्यूं बेस। पंडित शोभाराम के पुत्र धसमदेव ने सिमतोली बसाया। इनके तीन पुत्रों ने तीन गांव बसाए। रुद्रदेव पंचुर गांव में बसे। पंडित देवेंद्र थपलियाल मासों गांव में बसे पंडित बृहस्पति जी खैड गांव में बसे। सिमतोली से सौनाराम, बसवानन्द और उनके एक भाई बंगनी आकर बसे। कुछ थपलियाल लोग श्रीकोट, चिलौली, ब्राह्मण थाला, नंदवाण गांव धनसारी आदि गॉवों में बस गए। तब तक भाषा के मुखसुख सिद्धांत के अनुसार थपलियालों के शब्द उच्चारण में यह अंतर आया कि लोग उन्हें थपल्याल कहने लगे।

1960-65 तक भी थपल्याल ही कहते थे। जैसे अंग्रेज़ी का वर्चस्व बढ़ा थपलियालों ने अंग्रेज़ी में वर्ण इस प्रकार लिए Thapliyal यही कारण है कि अधिकतम थपलियाल इस शब्द का सही उच्चारण स्वयं भी नही करते, दूसरों से तो उम्मीद ही क्यों की जाय? यह बताना इसलिए जरूरी था क्योंकि आज 170 से अधिक गॉवों में थपलियाल रहते हैं। उनकी कुल देवी ज्वालपा देवी है, साथ ही गुसाईं, नेगी, बिष्ट आदि भी मा ज्वालपा के प्रति अपार श्रद्धा रखते हैं। आज बिना कोई भेद के इस क्षेत्र में अविवाहित कन्याएं अपने लिए सुयोग्य वर की कामना करने आती हैं। जिसका वर्णन आगे पढ़ने को मिलेगा। यह संदर्भ इस लिए भी जरूरी है क्योंकि ज्वालपा धाम एक सिद्धपीठ है।
क्रमशः 3

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