विवाह संस्था पर मंडराती स्वछंदता की छाया

लेखक-पार्थसारथि थपलियाल

नातन भारतीय संस्कृति में विवाह केवल दो व्यक्तियों के बीच किया गया सामाजिक अनुबंध नहीं,बल्कि एक गहन आध्यात्मिक,नैतिक और सांस्कृतिक संस्कार रहा है। यह संस्कार दो परिवारों,दो कुलों और दो जीवन-दृष्टियों के समन्वय का माध्यम होता था। ऋत,सत्य और निष्ठा जैसे शाश्वत मूल्यों पर आधारित गृहस्थाश्रम को जीवन के चार आश्रमों में सर्वोच्च स्थान दिया गया,क्योंकि इसी आश्रम से समाज, संस्कृति और राष्ट्र की निरंतरता सुनिश्चित होती थी। सप्तपदी के सात चरण केवल वैवाहिक अनुष्ठान नहीं थे,बल्कि जीवनभर निभाए जाने वाले कर्तव्यों,संयम और परस्पर उत्तरदायित्व के व्रत थे। इसी मजबूत विवाह संस्था ने सहस्राब्दियों तक भारतीय समाज को स्थिरता,सुरक्षा और नैतिक संतुलन प्रदान किया।

विवाह दांपत्य जीवन का पवित्र बंधन
आज का भारत बदलते समय, बदलती सोच,बदलती जीवनशैली के साथ जहाँ विकास की ओर अग्रसर है,वहीं उसकी पारिवारिक संरचनाओं-विशेष रूप से विवाह और गृह-संस्कार में तेजी से गिरावट भी देखने को मिल रही है। सनातन परंपरा में विवाह अधिकार नहीं, बल्कि दायित्व और पवित्रता से निभाई जाने वाली जीवन-साधना है। विवाह मर्यादाओं के साथ दांपत्य जीवन में प्रवेश का पवित्र संस्कार है। सात जन्मों का संबंध,सप्तपदी के सात वचन और अग्नि के साक्षी भाव से निर्मित यह बंधन सदियों तक स्थायी माना जाता रहा है। किंतु इक्कीसवीं सदी में तीव्र सामाजिक परिवर्तन,तकनीकी क्रांति और उपभोक्तावादी जीवन-शैली ने इस पवित्र संस्था को गहरे स्तर पर प्रभावित किया है। आज विवाह होते ही परिवार टूट रहे हैं,छोटी छोटी बातों को लेकर पति-पत्नी की नोक झोंक पारिवारिक कलह होकर, विवाह-विच्छेद बढ़ रहे हैं,युवाओं में विवाह के प्रति असुरक्षा भावना उभर रही है और पारिवारिक विघटन समाज शास्त्रियों के लिए चिंता का विषय बन गया है।

बदलती जीवन शैली और व्यस्तताएं
समाजशास्त्री मिलियन फाउंडेशन (2022) के सर्वे में पाया गया कि महानगरों में 68 प्रतिशत वैवाहिक कलह का मूल कारण लाइफ-स्टाइल क्लैश है।पति पत्नी दोनों कामकाजी हों तो समय का अभाव,आपसी संवाद की कमी,निजी स्पेस की गलत परिभाषा और आधुनिकता को स्वच्छंदता मान लेने का भ्रम,विवाह को कमजोर कर देता है। उदाहरण के लिए-बेंगलुरु में नीलम और विपुल की शादी को तीन वर्ष भी नहीं हुए थे कि दोनों के वर्क-लाइफ स्टाइल में टकराव और सोशल मीडिया के अत्यधिक उपयोग ने संबंधों में अविश्वास पैदा कर दिया। काउंसलिंग विफल रही और मामला तलाक तक पहुँचा।

मोबाइल फोन और अनावश्यक नेटवर्किंग
इस संकट को और गहरा करने में मोबाइल संस्कृति और अनियंत्रित सोशल नेटवर्किंग की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण है। स्मार्टफोन ने जीवन को सुविधाजनक बनाया,किंतु उसने भावनात्मक दूरी भी बढ़ाई। निरंतर चैटिंग,सोशल मीडिया पर आभासी संबंध,डिजिटल गोपनीयता के नाम पर छुपाव और देर रात तक मोबाइल उपयोग ने दांपत्य जीवन में अविश्वास को जन्म दिया है। अनेक मामलों में संदेह ही विवाद का कारण बनता है,चाहे उसके पीछे ठोस आधार हो या न हो। मोबाइल ने भावनाओं को क्षणिक बना दिया और संबंधों की गहराई को सतही बना दिया है।

उपभोक्तावाद का दुष्प्रभाव
उपभोक्तावादी संस्कृति ने भी विवाह संस्था को भीतर से कमजोर किया है। विवाहोपरांत जीवन में दिखावा, ब्रांडेड जीवनशैली,महंगे शौक और सामाजिक प्रतिस्पर्धा ने आर्थिक दबाव बढ़ा दिया है। जब आय और व्यय के बीच संतुलन बिगड़ता है,तो तनाव घर में प्रवेश करता है। आर्थिक तनाव धीरे-धीरे मानसिक तनाव में बदल जाता है और दांपत्य जीवन में कटुता उत्पन्न करता है। भारतीय संस्कृति में संतोष को सद्गुण माना गया,किंतु आधुनिक उपभोक्तावाद ने संतोष को पिछड़ेपन का प्रतीक बना दिया है।

अपसंस्कृति लिव-इन रिलेशनशिप
लिव-इन संबंधों की बढ़ती स्वीकार्यता ने भी विवाह संस्था को विकल्प के रूप में प्रस्तुत किया है। न्यायिक दृष्टि से यह व्यवस्था वयस्कों की स्वतंत्रता और सुरक्षा के लिए बनाई गई है,किंतु सामाजिक- सांस्कृतिक स्तर पर इसका प्रभाव भिन्न दिखाई देता है। लिव-इन संबंध तात्कालिक भावनाओं पर आधारित होते हैं,जहाँ दायित्व और स्थायित्व की अपेक्षा न्यूनतम होती है। इससे युवाओं में विवाह के प्रति प्रतिबद्धता कमजोर होती है और विवाह को जीवन-साधना के बजाय एक प्रयोग की तरह देखने की प्रवृत्ति बढ़ती है।

कानूनी परिवर्तनों ने भी विवाह की पारंपरिक अवधारणा को प्रभावित किया है। निजता का अधिकार, सहमति आधारित संबंधों की वैधता और सीमित कानूनी संरक्षण ने राज्य के नैतिक हस्तक्षेप को कम किया है। कानून का उद्देश्य नैतिकता थोपना नहीं,बल्कि स्वतंत्रता और गरिमा की रक्षा करना है,किंतु इसके सामाजिक प्रभावों पर गंभीर विमर्श आवश्यक है। जब विवाह को अनिवार्य संस्था के बजाय वैकल्पिक व्यवस्था के रूप में देखा जाने लगता है,तो सामाजिक अनुशासन कमजोर पड़ता है। हालांकि यह भी सत्य है कि कानून सामाजिक परिवर्तन का कारण कम और दर्पण अधिक होता है; समाज पहले बदलता है,कानून बाद में उसे मान्यता देता है।

बिखरते परिवार टूटते संस्कार
भारतीय समाज में संयुक्त परिवार व्यवस्था विवाह की स्थिरता की सबसे बड़ी आधारशिला रही है। माता-पिता और बुजुर्गों का मार्गदर्शन,अनुभव और अनुशासन दांपत्य जीवन को संतुलित बनाए रखते थे। किंतु शहरीकरण और व्यक्तिगत स्वतंत्रता की तीव्र आकांक्षा ने संयुक्त परिवारों को विघटित कर दिया। परिवार से अलगाव के साथ पति-पत्नी पर जिम्मेदारियों का बोझ बढ़ा और सहनशीलता घटती गई। बुजुर्गों की अनुपस्थिति में छोटी समस्याएं भी बड़े विवादों में बदलने लगीं।

विवाह संस्था पर कानूनी प्रहार
आधुनिक विधि-व्यवस्था, व्यक्ति- केंद्रित स्वतंत्रता पर अधिक बल देती है। उच्चतम न्यायालय द्वारा निजता के अधिकार को मौलिक अधिकार के रूप में मान्यता,सहमति से बने संबंधों के अपराधी करण का अंत, और लिव-इन रिलेशनशिप को सीमित कानूनी संरक्षण,ये सभी परिवर्तन राज्य के नैतिक हस्तक्षेप को कम करते हैं। कानून का उद्देश्य यहाँ नैतिकता थोपना नहीं,बल्कि वयस्कों की स्वतंत्रता और गरिमा की रक्षा करना है। यही दृष्टिकोण सनातन संस्कृति पर प्रहार कर, युवावर्ग को भारतीय संस्कृति से विमुख कर रहा है। सहमति आधारित संबंधों की वैधता ने युवाओं में विवाह से पहले या विवाह से बाहर संबंधों को सामाजिक रूप से अधिक स्वीकार्य बनाया है। इससे विवाह को “अनिवार्य” संस्था के बजाय “विकल्प” के रूप में देखने की प्रवृत्ति बढ़ी है।

परिणामस्वरूप विवाह में विलंब और कुछ मामलों में विवाह से बचने की मानसिकता भी दिखाई देती है। भारत में कई कानूनों ने वैवाहिक संस्कार को संकट में डाल दिया है। भारतीय दंड संहिता के अनुच्छेद 498 A का जब इस तरह दुरूपयोग किया गया,झूठे मुकदमे में दर्जकर अनेक प्रताड़नाएं परिवारों को झेलनी पड़ी यह भी विवाह के प्रति समाज में भय और आशंका पैदा करता है। शहरीकरण, वैश्वीकरण,आर्थिक स्वतंत्रता,शिक्षा, डिजिटल संस्कृति और उपभोक्तावादी दृष्टि,ये सभी कारक विवाह की धारणा को पहले ही बदल रहे थे। कानून ने केवल उस बदले हुए सामाजिक यथार्थ को मान्यता दी है।

वयस्कता की देहरी से मिलती चुनौती 
भारतीय संस्कृति में माता-पिता और बड़े-बुजुर्गों का मार्गदर्शन नियामक की भूमिका निभाता है। यह गजब का कानून है वयस्क होते ही संताने माता पिता के अनुशासन से बाहर हो रहे हैं। अक्सर प्रेम जाल में जकड़े युवा सीधे चुनौती दे रहे हैं कि हम वयस्क हो गये हैं,अपना निर्णय स्वयं लेने में सक्षम हैं। क्या,जिन माता- पिता ने अपनी संतान को लाड प्यार से पाला,उनकी परवरिश की,पढ़ाया लिखाया,स्वयं अभावों में रहकर उनकी आवश्यकताओं को पूरा किया,वही 18 वर्ष के होते ही आंखें दिखाना शुरू कर रहे हैं। आये दिन जानकारियों में आता है कि ऐसे संबंधों का परिणाम कोठों तक पंहुचा देता है या फ्रिज में टुकड़े टुकड़े मिलते हैं। यह प्रेम नहीं वासना की शुरुआती उम्र होती है।

परिवार संस्था का टूटना विडंबना
भारत का वैश्विक मंत्र है- “वसुधैवकुटुंबकं”। यद्यपि पाणिग्रहण संस्कार में वर के वाम भाग में बैठने के बाद वधू को वर की अर्द्धांगिनी होने का अधिकार मिल जाता है। इस बात को “शतपथ ब्राह्मण” में इस रूप में बताया गया है – यदैवं जाता विन्वतेगंथ प्रजायते तहिं हि सर्वो भवति। अर्थात जब पुरुष पत्नी को प्राप्त कर लेता है,तब वह पूर्ण होता है। सनातन संस्कृति में पत्नी,पुरुष का आधा अंग मानी जाती है,इसीलिए वह अर्द्धांगिनी कहीं जाती है। बिना पत्नी के धार्मिक अनुष्ठान पूर्ण नहीं होते।

राजनीति ने सनातन संस्कृति को दुष्प्रभावित किया है। बहुत सोची समझी चाल से धर्मनिरपेक्ष शब्द को संविधान में जोड़कर सनातन समाज को धर्म विहीन बना दिया है। धर्म मजहब या रिलीजन नही है। धर्म तो इस लोक और परलोक को सुधारने की बात कहता है। मानवता के ज्ञान से भटके लोग सनातन का आधार, परिवार/कुटुम्ब को तोड़ने में लगे हैं। NSSO (2019) की रिपोर्ट बताती है कि 1990 के बाद संयुक्त परिवारों में 45% की कमी आई और वैवाहिक विवादों में 60 प्रतिशत वृद्धि हुई है। उदाहरण-जयपुर में एक दंपति ने सिर्फ इसलिए अलग होने का निर्णय लिया क्योंकि पत्नी, सास-ससुर के साथ नहीं रहना चाहती थी,जबकि पति अपने माता-पिता को छोड़ना नहीं चाहता था। मामला बिना गंभीर कारण तलाक में बदल गया।

महिला-पुरुष संबंधों में स्वछंदता
स्त्री-पुरुष समानता और स्वतंत्रता प्रगतिशील मूल्य हैं,परंतु स्वतंत्रता को स्वच्छंदता समझ लेने से विवाह प्रभावित हुआ। यह समस्या दोनों पक्षों में है। सर्वे बताते हैं कि 32 प्रतिशत पति और 27 प्रतिशत पत्नियाँ विवाहोपरांत किसी अन्य संबंध में लिप्त होने को पति-पत्नी के विवाद का कारण मानते हैं। सनातन संस्कृति में विवाह तो संबंधों की पवित्रता पर आधारित होता है।

तलाक संस्कृति और कानूनी दुरुपयोग
अनेक समाजशास्त्रीय अध्ययनों में यह तथ्य उभरकर सामने आया है कि तलाक अब महज़ अंतिम समाधान नहीं,बल्कि कभी-कभी एक ‘रणनीति’ की तरह उपयोग किया जाने लगा है। कुछ मामलों में: गलत घरेलू हिंसा के आरोप, मानसिक प्रताड़ना के झूठे मुकदमे और आर्थिक लाभ के उद्देश्य भी सामने आते हैं। उच्च न्यायालयों और सर्वोच्च न्यायालय ने भी यह पाया है, आधुनिकता के कारण पतियों को झूठे मुकदमे में फंसाया जा रहा है। “झूठा मुकदमा दायर कर पति को प्रताड़ित करना भी मानसिक क्रूरता है।” उदाहरण के लिए- 2023 का एक केस में अदालत ने पत्नी द्वारा निरर्थक मुकदमेबाजी को पति के लिए मानसिक अत्याचार माना। इस प्रवृत्ति ने ईमानदारी से विवाह निभाने वाले युवाओं को भयभीत कर दिया है।

मनोरंजन माध्यमों का जीवन पर प्रभाव
मेन स्ट्रीम मीडिया, OTT Plate Form, फिल्मों और सोशल प्लेटफॉर्म में प्रेम-त्रिकोण,विवाह- बाह्य संबंध,और तात्कालिक आकर्षण को सामान्य घटना की तरह प्रस्तुत किया जाता है। यह नैतिक धुँधलापन युवा मन को प्रभावित करता है और विवाह की पवित्रता कमजोर होती है। उदाहरण : भारत में 15- 24 वर्ष के युवाओं पर हुए एक सर्वे (2018, लोकनीति) में पाया गया कि 26 प्रतिशत युवा विवाह-पूर्व संबंध को ‘ठीक’ मानते हैं,जबकि सामाजिक- सांस्कृतिक रूप से यह विचार विवाह की स्थिरता के विपरीत है।

विवाह संस्कार की महत्ता का क्षरण
सनातन संस्कृति में विवाह संस्कार है,अनुबंधन नहीं। सात वचन जीवन भर के नैतिक,मानसिक,आध्यात्मिक और सामाजिक दायित्वों को निर्धारित करते हैं। आज विवाह ‘इवेंट-मॉडल’ बन गया है-भव्य लोकेशन,फोटोशूट,थीम-वेडिंग, दिखावा ने संस्कार को औपचारिक बना दिया है। पाणिग्रहण संस्कार की महत्ता को कम कर,बारबार वीडियो ग्राफर,कैमरामैन अपनी मर्जी के पोज देने के लिए पूजा विधान को भंग करते रहते हैं। माता पिता भी कहते सुने जाते हैं “पंडित जी फेरे जल्दी करा लो”। नव जीवन में प्रवेश करने वाले वर-वधू भी इस संस्कार को प्रदर्शनी बनाना ही उचित समझते हैं। जिन लोगों को समझना चाहिए कि दांपत्य जीवन में उनकी मर्यादाएं क्या होंगी,वे वीडियो ग्राफर की ज्यादा सुनते हैं। बोया पेड़ बबूल का आम कहां से खाए। जहाँ संस्कार कमजोर होता है,वहाँ बंधन भी टिक नहीं पाता।

शोध-सर्वे क्या कहते हैं
यद्यपि इस विषय पर अखिल भारतीय स्तर पर एक बड़ा सरकारी अध्ययन सीमित है,किंतु अनेक निजी शोध संस्थाओं,समाज शास्त्रियों और फैमिली-कोर्ट रिकॉर्ड के आधार पर स्पष्ट संकेत मिलते हैं कि 2010 के बाद तलाक दर दोगुनी हुई,वैवाहिक विवादों के लगभग 70 प्रतिशत मामलों में तकनीक आधारित संवाद-समस्या मौजूद होती है,18-35 वर्ष आयु वर्ग में विवाह-भय बढ़ रहा है,परिवार से अलगाव के बाद विवाह टूटने की संभावना 45 प्रतिशत अधिक होती है।

बेटियों के जीवन में मायके का हस्तक्षेप
विवाह के बाद लड़की के माता-पिता का दायित्व है कि वे अपनी बेटी को अपने नये घर में एडजस्ट होने दें। होता यह है कि बार बार फोन आदान प्रदान से नव-दांपत्य जीवन स्थिरता की ओर नही बढ़ पाता। सर्वे बताते हैं लगभग 50 प्रतिशत वैवाहिक विवादों में मायके पक्ष का योगदान होता है। विवाह एक इवेंट नहीं,संस्कार है। नव जीवन में सम्मान,त्याग,आत्म संयम, पारिवारिक मर्यादाएं, सहनशीलता और पारिवारिक उत्तरदायित्व का समन्वित संस्कार हैं। नव विवाहित दंपति नये सपनों को सरसता और मधुरता से आरंभ करेंगे तो उनके जीवन में खुशियां ही खुशियां होंगी। संताने संस्कारवान होंगी। भारत में वृद्धाश्रमों की आवश्यकता नहीं होंगी। पारिवारिक न्यायालय भी कम कर दिए जायेंगे। दोनों परिवारों में सहृदयता बनी रहेगी।