सुधीर राखेचा… एक पुण्यस्मरण

मैं 1983 से 2011 तक (आकाशवाणी में सेवा के दौरान) मारवाड़,राजस्थान में रहा। 1983 में प्रसारण निष्पादक के रूप में जोधपुर से प्रसारण यात्रा शुरू की। तब सुधीरजी संभवतः आकाशवाणी ग्वालियर,में कार्यक्रम निष्पादक थे। वे जोधपुर के ही जाये जन्मे थे। जब कभी छुट्टी जोधपुर आते तो बहुत आत्मीयता से मिलते थे। संभवतः 1987-88 में उनका ट्रांसफर जोधपुर हो गया था। तब से उनके साथ एक अच्छे दोस्त जैसे संबंध रहे। उन दिनों आकाशवाणी में ट्रांसफर होना एक वास्तविकता थी। हम मिलते बिछुड़ते रहे,लेकिन आत्मीय संबंधों की स्निग्घता वैसे ही बनी रही जैसे मालवेजी और महेंद्र मोदीजी के भाव में रही है।

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सुधीर जी बहुत अच्छे लेखक,उच्च कोटि के प्रोड्यूसर,योजनाकार और सह कर्मी-धर्मी थे। कुछ लोग हम सबकी जीवन यात्रा में ऐसे मिलते हैं उन्हें संबंधों में परिभाषित नहीं कर सकते हैं। क्या भूलूं क्या याद करूं! कुलविंदर सिंह कंग से अधिकतर प्रसारक परिचित हैं। उनकी जोधपुर पोस्टिंग के दौरान सुधीरजी एक व्यंग्य विनोद का कार्यक्रम के लेखक और प्रस्तुतकर्ता थे। कुलविंदर सिंह कंग और शांति माथुर इस (उल्टा-पुल्टा जैसा) कार्यक्रम की बेहतरीन परिकल्पना सुधीरजी की थी। आप अनुमान लगा सकते हैं जहां हों कंग,वहां क्यों न हो प्रसंग। यह कार्यक्रम बहुत लोकप्रिय हुआ था। इसी प्रकार सुधीरजी एक रेडियो कार्टून “उल्टी गंगा” भी लिखते थे। 5 मिनट का यह व्यंग्यात्मक कार्यक्रम उन व्यवस्थाओं पर चोट करता था जिन से लोक हित बाधित होते थे।

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गत सप्ताह ही बड़ी अपणायत के साथ उन से हताई (वार्तालाप) की थी। शारीरिक कष्ट में थे लेकिन पुराने संस्मरणों से कुछ देर हंसी ठिठोली भी की। अभी लगभग 68 वर्ष की आयु ही हुई थी। चलने फिरने में सहज नहीं थे। 2 जनवरी 2026 को घर में फिसले,सिर पर चोटी लगी,अचेत हुए। बिना कुछ कहे देवलोक गमन कर गये। एक सांस्कृतिक माला टूट गई। ईश्वर दिवंगत आत्मा को आवागमन के बन्धन से मुक्त करें। ऐसी प्रार्थना है।

टूट गई है माला मोती बिखरे गये
दो दिन रह कर साथ जाने किधर गये…..

-पार्थसारथि थपलियाल की कलम से