क्षमा वीरस्यभूषणं…..
महावीर जयंती- प्रेरक प्रसंग
जोधपुर(दूरदृष्टीन्यूज), क्षमा वीरस्यभूषणं…..। आज महावीर जयंती है। ईस्वी सन से 599 वर्ष पूर्व उनका जन्म एक क्षत्रिय राज परिवार में हुआ था। 30 वर्ष की आयु में उन्हें वैराग्य हो गया और उन्होंने 12 वर्षों तक तपस्या की। उन्हें कैवल्य ज्ञान प्राप्त हुआ।
भगवान महावीर के जीवन का एक प्रसंग
एक बार जब भगवान महावीर कठोर तपस्या और विहार करते हुए एक वन प्रदेश से गुजर रहे थे,उस क्षेत्र में एक अत्यंत विषैला और क्रूर सर्प रहता था,जिसका नाम था चंडकौशिक। वह इतना भयंकर था कि उसके विष से प्राणी तत्काल मृत्यु को प्राप्त हो जाते थे। गाँव के लोग उस क्षेत्र में जाने से भी भयभीत रहते थे।
भगवान महावीर,जो “अहिंसा परमो धर्मः” के साक्षात प्रतिपादक थे, निर्भय भाव से उसी मार्ग पर आगे बढ़े। जब चंडकौशिक ने उन्हें देखा, तो वह क्रोध से उग्र होकर फुफकारने लगा और भगवान को डसने का प्रयास करने लगा। उसने कई बार विष उगला,किन्तु भगवान महावीर पूर्णतया शांत,निर्विकार और ध्यानस्थ रहे।
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भगवान महावीर ने उस सर्प को न तो शाप दिया,न ही उससे बचने का कोई प्रयास किया। उन्होंने केवल अत्यंत शांत और करुणामय स्वर में कहा-“हे जीव! क्रोध और हिंसा तुम्हारे लिए ही विनाश का कारण हैं। शांत हो जाओ,अपने स्वभाव को पहचानो।”उनकी वाणी में इतनी करुणा और आत्मबल था कि धीरे-धीरे चंडकौशिक का क्रोध शांत होने लगा। उसका विष उतर गया और वह शांत होकर भगवान के चरणों में लिपट गया। चंडकौशिक सर्प ने अपने हिंसक स्वभाव को त्याग दिया और अहिंसा के मार्ग पर अग्रसर हुआ। इस प्रकार एक अत्यंत क्रूर जीव भी भगवान महावीर की करुणा और तप के प्रभाव से परिवर्तित हो गया।
आज यह ज्ञान सर्प की बजाय उन मनुष्यों के लिए अनुकरणीय है जिन्हें पद प्रतिष्ठा,धन वैभव मिलते ही अहंकार हो जाता है। व्यक्ति विनम्र होने की बजाय प्रतिशोध लेने में मानवता को नष्ट कर देता है। इस दौर में यूक्रेन रूस और अमेरिका- इस्राइल और ईरान में पद और वैभव का अहंकार यही कर रहा है। ट्रंप में विनम्रता होती तो विश्व में हा हाकार न होता।क्षमावीरस्यभूषणं ।।
क्षमा वीर का आभूषण है।
।। जय जितेंद्र जय जिनेंद्र।।
-पार्थसारथि थपलियाल की कलम से
