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मेरी गढ़वाल यात्रा:- (1) इतिहास पर एक दृष्टि

लेखक पार्थसारथि थपलियाल

(मैं 11 अक्टूबर 2021 से गढ़वाल की यात्रा पर हूँ, इस यात्रा में गढ़वाल से सम्बंधित कुछ सांस्कृतिक जानकारियां आपके साथ साझा करने का प्रयास करूंगा।। इस बीच मेरी शब्द सन्दर्भ श्रृंखला स्थगित रहेगी)

आज का उत्त्तराखण्ड जिसमें गढ़वाल, कुमाऊं और जौनसार अंचल हैं, प्राचीन काल में इसे तपोभूमि, देवभूमि, पुण्यभूमि आदि अलंकृत नामों से जाना जाता था, यह क्षेत्र दो भाषाई भागों में बंटा हुआ था। गढ़वाल और जौनसार अंचल को केदारखण्ड और कुमाऊं (कूर्मांचल) अंचल को मानसखंड कहते थे। एक समय ऐसा भी था जब गढ़वाल और कुमाऊँ क्षेत्र पर कत्यूरी वंश के राजाओं का राज्य था, जिनकी राजधानी कार्तिकेयपुर (जोशीमठ) थी। एक भविष्यवाणी के कारण उन्होंने अपनी राजधानी कुमाऊं स्थानांतरित कर दी।

धीरे धीरे केदारखंड क्षेत्र पर उनकी पकड़ कमजोर हुई और स्थानीय स्तर पर जो बलशाली लोग थे उन्होंने छोटे छोटे राज्य (गढ़) स्थापित कर दिए। इस प्रकार एक समय गढ़वाल में 250 से अधिक गढ़ थे। इनमे एक गढ़ का नाम चांदपुर गढ़ी था, जो कर्णप्रयाग के निकट है। चांदपुर गढ़ी का राजा भानुप्रताप था। लोग उसे भौणा भी कहते थे। उसकी दो बेटियां थी। एक का विवाह कुमाऊं के राजपरिवार में हुआ था, दूसरी विवाह योग्य हो गई थी। एक दिन राजा के सपने में भगवान बदरीनाथ आये और कहा धारानगरी का राज कुमार यहां आया हुआ है, उससे अपनी कन्या का विवाह कर लो। उस युवक को ढूंढा गया। वह धारानगरी (धार,मध्यप्रदेश) के राजा वाक्पति का सौतेला भाई था जिसका नाम कनकपाल था। यह बात सन 887 ई. की है। परमार (पंवार) वंशी युवराज कनकपाल के साथ राजा भानु की पुत्री का विवाह कर दिया गया। वर्ष 888 ई. में भानुप्रताप ने कनकपाल को राजपाट सौंप दिया और स्वयं तीर्थ यात्रा पर निकल गए।
राजा कनकपाल के साथ शुरू में कुछ कारिंदे आये थे। कोई पाक-कला में दक्ष था, कोई पंडताई में, कोई वैदगिरी में, कोई राजकाज में, कोई युद्धकार्य में आदि आदि। इनमे वर्तमान उपजातियां खंडूरी, डिमरी,नौटियाल, थपलियाल,उनियाल,सेमवाल, बेंजवाल आदि 12 जातियों के लोग थे। गढ़वाल में आने से पहले सभी की मूल जातियां और थी। वर्तमान की सभी जातियाँ स्थान बोधक थी। जैसे-थापली में बसने से थपलियाल, नौटी में बसने से नौटियाल, डिमर में बसने से डिमरी आदि।

परंपरा में सर्यूल (भोजन तैयार करनेवाला ब्राह्मण,पाकशास्त्री) सबसे उच्च माने जाते थे। गढ़वाल में तीन प्रकार के ब्राह्मण चिन्हित थे। 1. सर्यूल, 2. गंगाणी और 3. नाना (विविध या अन्य)। सर्यूल का दायित्व उच्च चरित्र,आदर्श जीवन, वैदिक धर्मानुकूल हो के आधार पर राजते करता था। सर्यूल ब्राह्मणों का तैयार किया भोजन सभी जाति के लोग खाते थे। राजदरबार में सर्यूल थपलियाल भी राजगुरु, राजपुरोहित थे। पांचवी पीढ़ी के दलती सती को थापली गांव में राजा ने जागीर दे दी। ऐसे ही अन्य ब्राह्मणों को भी बसाया गया। यह माना जाता है कि भारत में उत्तरी क्षेत्र के ब्राह्मण पंच गौड़ और विंध्याचल से दक्षिणी भारत के ब्राह्मण पंच द्रविड़ हैं। गौड़ ब्राह्मणों का मूल स्थान गौड़ प्रदेश (वर्तमान में बंगाल का मालदा क्षेत्र) था, जहां से ये लोग भारत भर में फैले। मालवा क्षेत्र अपने नाम के अनुकूल मालवाला (धनधान्य से पूर्ण) होने के कारण अन्य क्षेत्रों के लोग भी यहां बसते गए। यह जनश्रुति है कि आदि गौड़ जाति में सत्यनिष्ठ ब्राह्मणों की एक शाखा सती नाम से प्रसिद्ध हुई। इनकी परंपरा इस प्रकार थी- जलसती थल सती, गोबर सती, नागुरसती…..
परमार जिन्हें गढ़वाल में पंवार कहा जाता है उस राज वंश की 37वी पीढ़ी में एक प्रतापी राजा हुआ जिसका नाम अजय पाल था उसका शासनकाल 1500 से 1548 ई. तक रहा। अजयपाल ने 52 बड़े गढ़ों सहित गढ़वाल के सभी छोटे बड़े राजाओं को पराजित कर एक राज्य बनाया जिसका नाम गढ़वाल पड़ा। गढ़वाल शब्द की उत्पत्ति यहीं से हुई। राजा अजयपाल ने सबसे पहले सीमांकन जिसे गढ़वाली में वाड कहते हैं का काम शुरू किया।
क्रमशः -2

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