सनातन संरक्षक और युवा मार्गदर्शक : स्वामी विवेकानंद

पार्थसारथि थपलियाल

स्वामी विवेकानंद केवल एक महान संन्यासी या दार्शनिक ही नहीं थे, बल्कि वे भारत की युवा चेतना के सबसे बड़े प्रेरक और पथप्रदर्शक थे। उनका चिंतन सनातन धर्म की गहराइयों से उपजा हुआ था,किंतु दृष्टि पूर्णतः आधुनिक,वैज्ञानिक और राष्ट्रनिर्माण से जुड़ी हुई थी। स्वामी विवेकानंद के अनुसार सनातन धर्म किसी जड़ कर्मकांड या संकीर्ण आस्था का नाम नहीं,बल्कि शाश्वत सत्य की खोज की जीवंत परंपरा है। वे स्पष्ट कहते हैं कि धर्म का वास्तविक उद्देश्य मनुष्य के भीतर निहित दिव्यता को प्रकट करना है। इसी कारण वे युवाओं को भाग्यवाद और हीनता से मुक्त होने का संदेश देते हैं। उनके शब्दों में-“उठो,जागो और तब तक मत रुको जब तक लक्ष्य प्राप्त न हो जाए।”यह केवल आध्यात्मिक नहीं,बल्कि युवा-जीवन का क्रांतिकारी सूत्र है।

विवेकानंद मानते थे कि भारत की सबसे बड़ी समस्या गरीबी या अज्ञान नहीं,बल्कि आत्मविश्वास का अभाव है। विशेषतः युवाओं में। सनातन दर्शन की आत्मा-“अहं ब्रह्मास्मि” को वे युवाओं के लिए आत्मबल का स्रोत बनाते हैं। उनका आग्रह था कि जब तक युवा स्वयं को शक्तिशाली, सक्षम और उत्तरदायी नहीं समझेगा,तब तक न व्यक्तिगत विकास होगा और न राष्ट्रीय उत्थान। शिकागो धर्म संसद में दिया गया उनका ऐतिहासिक भाषण केवल धार्मिक सहिष्णुता का संदेश नहीं था,बल्कि भारत के युवाओं के लिए वैश्विक मंच पर आत्म गौरव का उद्घोष था।

उन्होंने दिखाया कि सनातन परंपरा किसी से पीछे नहीं,बल्कि मानवीय मूल्यों में अग्रणी है। यह संदेश युवाओं को आत्महीन पश्चिमी अनुकरण से मुक्त कर स्वदेशी आत्मबोध की ओर ले जाता है। स्वामी विवेकानंद का सबसे बड़ा योगदान चरित्र-निर्माण पर उनका बल है। वे कहते थे कि केवल पुस्तकीय ज्ञान राष्ट्र नहीं बनाता, बल्कि साहस,अनुशासन और नैतिकता से युक्त युवा ही समाज का आधार बनते हैं। उनके लिए शिक्षा का उद्देश्य नौकरी नहीं,बल्कि “मनुष्य-निर्माण” था। यह दृष्टि आज की डिग्री-केंद्रित शिक्षा व्यवस्था पर गहरा प्रश्नचिह्न लगाती है।

विवेकानंद का युवा-दर्शन कर्मप्रधान है। “दरिद्र नारायण की सेवा” का उनका विचार युवाओं को सामाजिक उत्तरदायित्व से जोड़ता है। उनके अनुसार राष्ट्रभक्ति का वास्तविक अर्थ है-पीड़ित मानवता के लिए समर्पण। वे युवाओं को निर्भीक बनाना चाहते थे। उनका स्पष्ट मत था कि डर गुलामी की जड़ है,चाहे वह राजनीतिक हो,सामाजिक हो या मानसिक। सनातन धर्म की सहिष्णुता को वे कायरता नहीं, बल्कि आत्मबल से जोड़ते हैं। इसलिए विवेकानंद का युवा-मार्गदर्शन साहस, स्वाभिमान और आत्मसम्मान का पाठ पढ़ाता है।

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आज जब युवा पीढ़ी दिशाहीनता,भौतिक आकर्षण और मानसिक तनाव से जूझ रही है,स्वामी विवेकानंद का मार्गदर्शन अत्यंत प्रासंगिक हो उठता है। वे युवाओं को बताते हैं कि सच्ची सफलता केवल उपभोग में नहीं, बल्कि उद्देश्यपूर्ण जीवन में है। सनातन मूल्य-सत्य, सेवा,संयम और साहस,युवाओं के लिए स्थायी दिशा-सूचक बन सकते हैं। स्वामी विवेकानंद का सनातन और युवा-मार्गदर्शन भारत की आत्मा का जागरण है।

यह संदेश देता है कि युवा ही राष्ट्र की शक्ति हैं और सनातन धर्म उनका नैतिक एवं बौद्धिक आधार। विवेकानंद का विचार-दर्शन युवाओं को आत्मबोध से राष्ट्रबोध की ओर ले जाता है, जहाँ व्यक्ति का उत्थान ही समाज और राष्ट्र का उत्थान बन जाता है। स्वामी विवेकानंद जी के जन्मदिन को राष्ट्रीय युवा दिवस के रूप में मनाया जाता है। इस दिन पर उस चैतन्य पुरुष को नमन।