सामाजिक बहिष्कार और गवाहों को धमकाने पर हाईकोर्ट सख्त
-जांच अधिकारी को निष्पक्ष जांच सुनिश्चित करने के दिए निर्देश
जोधपुर(दूरदृष्टीन्यूज),सामाजिक बहिष्कार और गवाहों को धमकाने पर हाईकोर्ट सख्त। राजस्थान हाईकोर्ट की जोधपुर पीठ ने सामाजिक बहिष्कार, गवाहों को धमकाने और जांच को प्रभावित करने के प्रयासों पर कड़ा रुख अपनाते हुए स्पष्ट किया है कि कानून के शासन को कमजोर करने वाली ऐसी किसी भी गतिविधि को बर्दाश्त नहीं किया जाएगा।
न्यायालय ने जांच अधिकारी को निर्देश दिए हैं कि यदि किसी गवाह या संबंधित व्यक्ति की ओर से धमकी, सामाजिक बहिष्कार या दबाव की शिकायत मिलती है,तो उस पर तत्काल निष्पक्ष जांच कर आवश्यक कानूनी कार्रवाई की जाए।
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इस आदेश के साथ हाईकोर्ट ने याचिका का निस्तारण करते हुए स्पष्ट संदेश दिया कि सामाजिक बहिष्कार और गवाहों को डराने जैसी गतिविधियां कानून से ऊपर नहीं हैं। ऐसे मामलों में प्रशासन और जांच एजेंसियों की जिम्मेदारी है कि वे निष्पक्ष जांच और गवाहों की सुरक्षा सुनिश्चित करें।
न्यायमूर्ति फरजंद अली ने यह आदेश राजाराम पालीवाल की विविध आपराधिक याचिका का निस्तारण करते हुए पारित किया। याचिका में लूणी थाने में दर्ज एफआईआर की निष्पक्ष एवं स्वतंत्र जांच सुनिश्चित करने की मांग की गई थी। यह मामला अंतरजातीय विवाह के बाद परिवार के सामाजिक बहिष्कार से जुड़ा है।
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सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता की ओर से अधिवक्ता ऋतुराज देवल ने अदालत को बताया कि वर्तमान जांच अधिकारी के कार्य पर कोई आपत्ति नहीं है,लेकिन स्वतंत्र गवाहों को लगातार धमकियां देकर इसे प्रभावित करने का प्रयास किया जा रहा है। तीन गवाहों और उनके परिवारों के सामाजिक बहिष्कार का भी आरोप लगाया गया।
अंतरजातीय विवाह पर हुआ सामाजिक बहिष्कार:-
याचिकाकर्ता लूणी के लालावास निवासी राजाराम पालीवाल ने 3 दिसंबर 2022 को अंतरजातीय विवाह किया था। इससे नाराज होकर समाज के लोगों ने उनका बहिष्कार कर दिया। कई पंचायतें आयोजित की गईं,जिनमें परिवार को कथित रूप से बंधक बनाकर अपमानित किया गया और पहले एक लाख रुपए तथा बाद में 21 लाख रुपए की मांग की गई।
आरोप यह भी है कि रिश्तेदारों को परिवार से सामाजिक संबंध रखने पर बहिष्कार की चेतावनी दी गई,जिससे पूरा परिवार मानसिक और शारीरिक रूप से प्रताडि़त हुआ।
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गवाह को धमकाना यानि न्याय प्रणाली में हस्तक्षेप:-
हाईकोर्ट ने अपने आदेश में कहा कि पूर्व में दिए गए निर्देशों का उद्देश्य केवल एक मामले में निष्पक्ष जांच कराना नहीं,बल्कि सामाजिक बहिष्कार, डराने-धमकाने और दबाव जैसी अवैध सामाजिक प्रथाओं पर रोक लगाना भी है। अदालत ने स्पष्ट किया कि जांच के दौरान किसी भी गवाह को धमकाना, प्रभावित करना या सामाजिक रूप से प्रताडि़त करना आपराधिक न्याय प्रणाली में गंभीर हस्तक्षेप है।
अदालत ने निर्देश दिया कि यदि कोई गवाह या अन्य व्यक्ति जांच अधिकारी के समक्ष धमकी,सामाजिक बहिष्कार या दबाव की शिकायत प्रस्तुत करता है, तो वह अधिकारी उसका निष्पक्ष एवं शीघ्र परीक्षण करेगा तथा आवश्यक होने पर सुरक्षात्मक, निवारक और दंडात्मक कार्रवाई करेगा।
